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सात समुंदर पार से ‘जलियांवाला बाग की कराहें’

पुस्तक समीक्षा

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परतंत्र भारत में साहित्यकारों ने तमाम जोखिम उठाकर ब्रिटिश-दमन के नंगे सच को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया। दमनकारी सत्ता ने तुरंत ऐसे राष्ट्रवादी साहित्य को प्रतिबंधित कर उसे ब्रिटेन भेज दिया। विडंबना है कि आजादी की पौन सदी बीत जाने पर भी हम उस जब्त कथित प्रतिबंधित साहित्य से वाकिफ नहीं हैं। जान जोखिम में डालने वाले उन रचनाकारों-प्रकाशकों के नाम तक हम नहीं जानते। इन स्वतंत्रता आकांक्षियों के अकथनीय योगदान के साथ हमें, तीन दशक तक हरियाणा के अभिलेखागार में उपनिदेशक के रूप में कार्यरत रही व साहित्यकार राजवन्ती मान को भी मान-सम्मान देना होगा, जिन्होंने ब्रिटेन में खाक छानते हुए इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड से जब्त जन-साहित्य को तलाशा। विश्व के इस वृहतर अभिलेख भंडार से दस्तावेज निकालना आसान नहीं था। इन श्रमसाध्य प्रयासों से यह प्रामाणिक व विश्वसनीय पुस्तक ‘जलियांवाला बाग की कराहें’ अस्तित्व में आई।

सही मायनों में ‘जलियांवाला बाग की कराहें’ किताब जलियांवाला बाग के भीषण नरसंहार की अतिशय वेदना, फिरंगियों के क्रूर जुल्मों की कथा-व्यथा से हमें अवगत कराती है। वे अत्याचार जिन्होंने भारतीयों की आत्मा को कुचला, चश्मदीदों ने देखा और साहित्यकारों ने लिखने का जोखिम उठाया। ये जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए लिखा गया दुर्लभ साहित्य है। दुर्भाग्य यह है कि इतिहासकार एक सदी बाद तक इस साहित्य के साथ न्याय नहीं कर पाए। इन दस्तावेजों में रचनाकारों के जनपक्षीय सरोकार, जन-विमर्श, सांस्कृतिक बोध और समय का जीवंत यथार्थ मुखरित होता है।

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पुस्तक में जलियांवाला बाग के बाद लिखा चर्चित नाटक जख्मी पंजाब, जलियांवाला बाग का माहात्म्य, पंजाब का खून, गौरांग गुणानुवाद, सांगीत ः बागे-जलियान, पंजाब का हत्याकांड यानी बेकसों की आह, ओडायर शाही यानी मजलूम-ए-पंजाब शीर्षक रचनाएं दमन और उसके प्रतिकार का जीवंत यथार्थ बयां करती हैं।

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पुस्तक की मुख्य रचना जलियांवाला बाग में नरसंहार के प्रतिवाद में लाला किशनचंद जेबा द्वारा लिखा एकमात्र प्रामाणिक हिंदी ड्रामा है ‘जख्मी पंजाब’, जिसमें ब्रिटिश सत्ता के क्रूर दमन को विषय बनाया गया है। यह नाटक 1922 में लिखा गया, उसी साल ओमप्रकाश साहनी एंड ब्रदर्स, लोहारी दरवाजा, लौहार से प्रकाशित किया गया। रचना में प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सच्चाई सामने लाई गई। लाला किशनचंद जेबा उस समय के जाने-माने नाटककार थे, उन्होंने तत्कालीन सच्चाइयों को जीवंतता से उकेरा। निश्चय रूप से इस श्रमसाध्य कार्य के लिए राजवन्ती मान साधुवाद की पात्र हैं। इस पुस्तक को हर भारतीय को पढ़ना चाहिए, बल्कि इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।

पुस्तक : जलियांवाला बाग की कराहें लेखिका : राजवन्ती मान प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स, नयी दिल्ली पृष्ठ : 320 मूल्य : रु. 399.

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