दिनकर कहते हैं—भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है। इसी तर्ज पर हम कह सकते हैं कि भारत कभी कोई शासनात्मक इकाई नहीं रहा। अगर आज भी देखें तो वह एक गणतंत्र है। वास्तव में, गणों के बीच समन्वय कितना है, यह विवादास्पद हो सकता है।
इस प्रकार की औपचारिक या अनौपचारिक इकाइयों और व्यवस्थाओं के बावजूद जीवन के अपने नियम होते हैं, और यदि कोई अनावश्यक बाहरी दबाव या हस्तक्षेप न हो, तो जीवन देर-सवेर अपनी एक व्यवस्था बना लेता है, जैसे कि किसी अरण्य में।
कभी आपने किसी वर्षा वन को सूक्ष्मता से देखा हो, तो वह व्यवस्था किसी बड़े पेड़ से भी समझ में आ जाती है। उस पर कई तरह के कीट-पतंगे और वनस्पतियां सहज भाव से एक साथ रहती हैं। शायद इसीलिए भारतीय दर्शन में आरण्यकों में वानप्रस्थ आश्रम में इसी का अभ्यास है—सहज समन्वय।
इसीलिए धरती पर सीमाएं नहीं हैं। जल, हवा, आकाश में सबका निर्बाध निर्वाह और गमनागमन है। कोई इनकी सीमाएं तय नहीं कर सकता। पाकिस्तान की लू, आंधी, भूकंप, बारिश और टिड्डियां क्या भारत में किसी के नियंत्रण में हो सकती हैं? सीमाएं अपने अनधिकृत अधिकार के चक्कर में खींची और बनाई जाती हैं, और वहीं विवाद और संघर्ष शुरू होते हैं। राष्ट्र की अवधारणा ऐसी ही एक अप्राकृतिक अवधारणा है, और इसकी नींव पर तरह-तरह के प्रपंच खड़े किए जा सकते हैं।
इस भूमिका से देश और राष्ट्र के अंतर को और उसकी विडंबनाओं को समझा जा सकता है। गत शताब्दी में राष्ट्रसंघ की स्थापना और राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में लड़े गए दो-दो महायुद्धों और आज के हर समय झूलते तनावों को रवींद्रनाथ ठाकुर ने अनुभव किया था और मानवतावाद की बात की थी।
लेखिका रोहिणी अग्रवाल के प्रस्तुत शोधपरक ग्रंथ का फलक बहुत बड़ा है, जिसमें हिंदी उपन्यासों और हाशिए के समाज के परिप्रेक्ष्य में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर विचार किया गया है, जो पाठक और समालोचक से भी गहन अध्ययन, विवेक और धैर्य की अपेक्षा करता है।
फिर भी विषय बहुत सामयिक और जरूरी है, जिसका निर्वाह विद्वान लेखिका रोहिणी ने बहुत मेहनत और ईमानदारी से किया है। विचार से बेहतर दुनिया के निर्माण का स्वप्न देखने वालों को इसे जरूर पढ़ना चाहिए।
पुस्तक : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : हाशिए का समाज और उपन्यास लेखिका : रोहिणी अग्रवाल प्रकाशक : लोक भारती, प्रयागराज पृष्ठ : 344 मूल्य : रु़. 499.

