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स्त्री-पुरुष संबंधों की पेचीदगियां

पुस्तक समीक्षा

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पंजाबी के जाने-माने कथाकार डॉ. करमजीत सिंह नडाला के अब तक दो मिनी कहानी-संग्रह और दो कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. नडाला के सद्यः प्रकाशित कहानी-संग्रह ग्लेशियर पिघल गया में कुल छह लम्बी कहानियां संगृहीत हैं। ये हैं—‘ऐसे ठीक नहीं रूपा’, ‘ग्लेशियर पिघल गया’, ‘वनवास’, ‘अंदर का महाभारत’, ‘लम्बी पतझड़’ और ‘मरीज’। मूलतः यह संग्रह पंजाबी में प्रकाशित हुआ था और इसका हिन्दी रूपान्तरण हिन्दी लेखिका एडवोकेट नीलम नारंग ने किया है। नीलम नारंग के हिन्दी रूपान्तरण की विशेषता यह है कि ‘ग्लेशियर पिघल गया’ में संगृहीत छहों लम्बी कहानियां पुनः सृजन की प्रक्रिया से गुजरकर सामने आई हैं और अपने समवेत पाठ में मूल रचना जैसा ही आस्वाद देती हैं। पंजाब की सोंधी माटी की गंध इनमें बरकरार है तथा पात्र अपने परिवेश सहित सजीव रूप में उपस्थित हुए हैं। पंजाबी भाषा के ठेठ मुहावरों की रंगत भी निरन्तर पाठक का मन बांधे रखती है।

डॉ. नडाला के इस कहानी-संग्रह की अधिकांश कहानियां स्त्री-पुरुष संबंधों की पेचीदगियों पर केंद्रित हैं। ‘ऐसे ठीक नहीं रूपा’ में मूल संकट आर्थिक विषमता का है। गरीब घर की रूपा ने एक संपन्न घर के राजकुंवर की कल्पना की थी, लेकिन उसका विवाह एक मिस्त्री से हो जाता है और वह बदचलनी के रास्ते पर चल पड़ती है। जाहिर है, इस रास्ते से लौटना संभव नहीं, बल्कि आकंठ दलदल में धंसते चले जाना है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘ग्लेशियर पिघल गया’ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि एक बार यदि स्त्री के संयम और मर्यादा का ग्लेशियर पिघल जाए, तो उसका ठिकाना न पति के घर में रह जाता है और न ही मायके में। जायदाद और पैसे का मोह आदमी को किस प्रकार बद से बदतर बना देता है, ‘वनवास’ कहानी इसी सच के रूबरू पाठक को खड़ा करती है।

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‘अंदर का महाभारत’ एक त्रिध्रुवीय कहानी है। इसका पहला ध्रुव आर्थिक और सामाजिक कारणों से प्रेम-संबंधों के अधूरे या असफल रह जाने की त्रासदी को उभारता है। दूसरा ध्रुव 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में निर्दोष सिखों की निर्मम हत्या के संदर्भ को सामने लाता है, जबकि तीसरा ध्रुव हरदीप की सच्ची मुहब्बत को उजागर करता है। ‘मरीज’ इस संग्रह की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी है। कथारस का निरन्तर बना रहना इन कहानियों की विशिष्टता है।

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पुस्तक : ग्लेशियर पिघल गया लेखक : डॉ. करमजीत सिंह नडाला अनुवादिका : एडवोकेट नीलम नारंग प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नई दिल्ली पृष्ठ : 129 मूल्य : रु. 380.

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