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‘कुएं की जगत पर बच्चा, बचाने को बेचैन कवि’

स्मरण : विनोद कुमार शुक्ल

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लेखक के अंतर्जगत और रचना प्रक्रिया के संदर्भ में मुक्तिबोध का एक महत्वपूर्ण कथन है, "रचना-प्रक्रिया के भीतर न केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है; वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है।’ इस दृष्टि से विनोद कुमार शुक्ल के लेखकीय अंतर्व्यक्तित्व की पड़ताल करते हैं तो उनकी ही एक कविता ‘दुनिया जगत’ याद आती है :-

दुनिया जगत/ जगत कुएं का/ जिस पर जाने कैसे/ चढ़ा एक नन्हा बच्चा/ आवाज़ नहीं दी मैंने उसको/ चौंककर कुएं के अंदर गिर जाता तो!/ चुपचाप धीरे-धीरे चला/ संभलकर उठाया मैंने गोद में उसको।/ बस, इतना मैं चुप रहा/ इतना धीरे चला/ बहुत चुप बहुत धीरे चला।

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इस कविता में कुएं की जगत पर जो बच्चा बैठा है, वह संवेदना है और चुपचाप धीरे-धीरे चलकर उसे गोद में उठाने वाला किरदार खुद विनोद कुमार शुक्ल हैं। उनका समूचा लेखन ख़तरे की जद में फंसी हुई संवेदना को बचाने का उपक्रम है। मद्धिम स्वर और मंथर गति उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के पहचान चिह्न हैं। जब सब अपने बारे में जोर-शोर से बोलते हुए एक अंधी दौड़ में शामिल हैं, विनोद जी किसी होड़ से अपने को अलग रखते रहे हैं। वे जानते थे कि जोर से बोलने या दौड़कर जाने से संवेदना हड़बड़ाकर कुएं में गिर सकती है।

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कवि की गोद में सुरक्षित संवेदना-शिशु उन्हें देखने के लिए एक ऐसी विलक्षण दृष्टि देता है, जो उन्हें एक समानांतर सृष्टि रचने की प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करती है। ‘देखना’ उनके सोच और सृजन का अनिवार्य अंग है। देखने पर उनको इतना भरोसा है कि एक कविता में वे कहते हैं :-

बहुत कुछ देखना बाक़ी है/ इसलिए मैं नीचे से ऊपर तक/ आंख हो गया हूं/ इस दिमाग़ से आंख हूं/ काम से आंख हूं।

विनोद जी की भाषा दृश्यात्मक भाषा है। वे आम जनजीवन के क्रिया-कलापों को दृश्य के रूप में देखते हैं और ये दृश्य उनकी जादुई भाषा का स्पर्श पाकर अनूठे बिम्बों के रूप में पाठक तक पहुंचते हैं। साधारण जीवन की गाथा में असाधारण जादुई सौंदर्य रचने वाले विनोद जी खुद साधारण जीवन के प्रतीक थे। उनसे मिलकर किसी को यह नहीं लग सकता था कि इस व्यक्ति ने कविता, कहानी और उपन्यास आदि विधाओं में 20 से अधिक उत्कृष्ट कृतियों की रचना की है और देश-विदेश के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित है।

चेहरा देखकर तिलक लगाने के इस दौर में विनोद कुमार शुक्ल विशिष्ट जन के अभिमान को नहीं, साधारण व्यक्ति के अपमान को जानते पहचानते थे। वे रईस के वैभव को नहीं, दुखी के दुख को जानते थे :- रईसों के चेहरे पर/ उठी हुई ऊंची नाक/ और कीमती सेंट!/ ख़ुशबू मैं नहीं जानता।

अपनी एक और प्रसिद्ध कविता में वे मनुष्य की हताशा को दिलासा देते हुए दिखते-लिखते हैं :- हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था/ व्यक्ति को मैं नहीं जानता था/ हताशा को जानता था।

मुक्तिबोध का एक वाक्य ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ अक्सर विनोद कुमार शुक्ल के सामने प्रश्नचिह्न की तरह खड़ा कर दिया जाता है। विनोद जी को ठीक से पढ़ें तो इसका जवाब उनके लेखन में ही मिल जाता है कि उनका पक्ष वही है जो मनुष्यता का पक्ष है। मनुष्य को बचाने की चिंता ही विनोद कुमार शुक्ल के सरोकार-वृत्त के केंद्र में है। जब वे मनुष्य को बचाने की बात करते हैं तो प्रकृति को बचाने की चिंता उसमें सन्निहित होती है। प्रकृति और मनुष्य को वे एक-दूसरे की संगति में ही संपूर्ण मानते हैं। सर्वदायिनी प्रकृति और सर्वग्रासी बाजार के संबंध को वे एक आदिवासी की नजर से देखते हैं और अपना पक्ष स्पष्ट कर देते हैं कि बाजार और जंगल में उन्हें बाजार ज्यादा भयावह लगता है :-

एक अकेली आदिवासी लड़की को/ घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता/ बाघ-शेर से डर नहीं लगता पर महुआ लेकर गीदम के बाजार जाने से/ डर लगता है।

उनके उपन्यासों में नायक, महानायक नहीं, साधारण पात्र मिलते हैं। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के रघुवर प्रसाद और सोनसी हों या हाथी पर रघुवर को लिफ्ट देने वाला साधु, सब साधारण जीवन से आए साधारण लोग हैं। ‘खिलेगा तो देखेंगे’ में भी किसी महानायक की प्रतीक्षा नहीं, साधारण जीवन के चित्र हैं। इनमें जो असाधारण है, वह उनका कहन है जो दुख को भी कलात्मक सौंदर्य के साथ संवेदनशील तरीके से अभिव्यक्त कर सकता है। खिलेगा तो देखेंगे उपन्यास में एक वाक्य है, ‘किसान-आदिवासी जहां सैकड़ों सालों से रह रहे थे, वहीं के शरणार्थी हो गए थे।’ इस वाक्य में आदिवासी किसानों के जीवन का यथार्थ और कहन का सौंदर्य एक साथ मौजूद है। मध्यम वर्ग के साधारण पात्रों के जरिये वे सामान्य जीवन के यथार्थ का जादू रचते हैं। ऐसा जादू रचते हुए उनका रचनाकार मन एक बच्चे की तरह तर्कसंगति से मुक्त हो जाता है। उनके उपन्यासों में जो घटनाएं ‘समझदार’ लोगों को अविश्वसनीय लगती हैं, एक बच्चे के लिए वे अकल्पनीय नहीं हैं। बाल सुलभ भोलापन उनके कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व में भी है।

समकालीनों के समूह में विनोद कुमार शुक्ल अलग से पहचान में आते हैं तो इसकी बड़ी वजह उनकी स्व-अर्जित विलक्षण दृष्टि और अनन्यतम शिल्प है। उनकी यह दृष्टि अंतिम समय तक उनके साथ रही। अपनी अंतिम कविता में वे बत्ती बुझाने की बात करते हैं। दिया-बत्ती पर हिंदी में अनेक कवियों ने कविताएं लिखी हैं और लगभग सभी की आकांक्षा दीपक के जलते रहने की है।

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, पेन/नाबोकोव पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल को पाठकों से भरपूर प्रशंसा मिली, पर हिंदी के साहित्यिक समाज के एक वर्ग ने उनके नाम पर विवादों को भी खूब हवा दी। कभी आर्थिक विपन्नता के सवाल पर तो कभी कभी ज्ञानपीठ पुरस्कार और 30 लाख रॉयल्टी के नाम पर। यहां तक कि उनकी मृत्यु पर भी एक कुछ लोगों ने विवाद खड़ा करने की कोशिश की। पर विनोद जी ने किसी भी विवाद के संदर्भ में कभी कोई प्रतिवाद नहीं किया। जीते जी प्रतिवाद नहीं किया तो मृत्यु के बाद क्या करेंगे। तमाम विवादों को विमर्शप्रिय लेखकों के विमर्श के लिए यहीं छोड़कर वे तो दिसंबर की इस ठंड मे गरिमा का गरम कोट पहनकर चले गए विचार की तरह।

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