चार दशक से भी अधिक समय से लेखन में सक्रिय लेखिका व पत्रकार क्षमा शर्मा की कहानियों को जहां एक तरफ स्त्रियों की पल-पल बदलती स्थितियों के दस्तावेज़ के रूप में देखा जा सकता है, वहीं वे समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार करने से भी नहीं चूकतीं।
इस संग्रह की पहली कहानी ‘मम्मी आ रही हैं’ नौकरी की वजह से घर से दूसरे शहर आई एक लड़की की कहानी है, जो आत्मनिर्भर बनना चाहती है और बंधी-बंधाई ज़िंदगी के उस दायरे से निकलना चाहती है, जो उसकी मां ने बचपन से ही उसके इर्द-गिर्द बना रखा है।
‘बात अभी खत्म नहीं हुई’ कॉरपोरेट संस्कृति की बनावट, इंसानी रिश्तों की जटिलता और भावनात्मक उधेड़बुन का प्रकटीकरण है।
‘दादी मां का बटुआ’ अपने तीखे व्यंग्य के माध्यम से आधुनिक मीडिया और समाज की उस मानसिकता को सामने लाती है। इसमें कन्या भ्रूण हत्या जैसी भयावह सामाजिक समस्या को तमाशे की तरह प्रस्तुत किए जाने को रेखांकित किया गया है।
‘बया’ दो साल बाद मायके आई लड़की की कशमकश का आईना है। भाई-भाभी की स्वार्थपरता से आहत होकर वह पिता और भाई से मिले बिना ही वापस लौट जाती है। मां का न होना उसके मन को रिक्त कर जाता है। उसे लगता है कि पिता, भाई और भाभी—सबकी स्निग्धता मां अपने साथ समेट ले गई है।
आधुनिक समाज, पुरुष मानसिकता और स्त्री उत्पीड़न पर गहरा मनोवैज्ञानिक तथा फैंटेसी-आधारित व्यंग्य ‘कमीज पहन रहा है जैक द रिपर’ नामक कहानी में किया गया है। हिंसा और बर्बरता के प्रतीक ‘जैक द रिपर’ के बहाने समाज में छिपी हुई क्रूरता को दर्शाया गया है। यह पंक्ति ही बहुत कुछ कह देती है— ‘आजकल जब से औरतों ने अपनी देह को पाया है, वे निर्लज्ज हो उठी हैं। इसलिए ऐसे क्लोन चाहिए जो कि स्त्री की देह से ही नहीं, उसकी आत्मा से भी जबरदस्ती कर सकें।’
संग्रह की अन्य कहानियां ‘लव स्टोरी 1994’ और ‘जय श्री राम’ भी बेबाकी से कई सच सामने लाती हैं। क्षमा जी की किस्सागोई हर कहानी के साथ पाठक को बांधे रखती है।
पुस्तक : कथा सप्तक - क्षमा शर्मा संपादक : आकाश माथुर प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर पृष्ठ : 126 मूल्य : रु. 250.

