आते हैं ऐसे दिन भी, कभी-कभी
लगने लगता है,
नहीं लग रहा जी।
आ खड़ी होती हैं निष्क्रियताएं,
बढ़ाए हाथ दोस्ती का, हर ओर से।
टहल आती है सोच,
टिका-टिका लाठी, दूर दूर तक,
जहां ‘कुछ नहीं’ के
कुछ नहीं मिलता।
अकेले हों
या बीच अपनों के,
बस यही लगता है हर क्षण
कि नहीं लग रहा जी।
यह वह समय होता है, जब आदमी
हो जाता है खुद अपने से भी बाहर।
खुद अपने ही भीतर के
जब बंद हो जाया करते हैं
प्रवेश द्वार तक।
यही वह समय होता है,
जब आदमी सब समयों से अधिक,
कमजोर होता है।
इतना कमजोर कि हर चीज
खुद से कहीं ज्यादा
ताकतवर दिखती है।
भूल जाता है वह कि
उसके भीतर एक खान है
चुनौतियों की।
भूल जाता है वह
उसके भीतर प्रतिरोध का एक सागर
हर वक्त मौजूद रहता है।
भूल जाता है वह कि
कितने ही पुरखों ने उसके
काल से होड़ की है,
और मात भी दी है।
बस यही भर याद हो आए अगर,
किसी राह की तरह,
ऐसे समय जब लगने लगे,
कि नहीं लग रहा जी
तो खुल जाएगा खुद-ब-खुद
बंद प्रवेश द्वार।
लौट जाएंगी तमाम निष्क्रियताएं,
समेट कर अपनी दोस्तियों के हाथ।
आ लगेगी वह ताकत,
खुद की खुद के गले से,
जिसके बिना कमजोर
हो जाता है आदमी,
लगने लगता है कि
नहीं लग रहा जी।

