तिरछी नज़र

कूलन में, केलि में वसंत

कूलन में, केलि में वसंत

मृदुल कश्यप

पिछले दिनों आभासी दुनिया में एक आभासी कविता मिली। इसमें आभासी जगत के आभासी कवि ने वसंत का वर्णन किया है। कवि कहता है–हे नादान मनुष्य! तू कूलन में, केलि में, वसन्त को कहां ढूंढता फिर रहा है? पहले तो यह बता कि तू कौन-सी दुनिया का प्राणी है। अपना संदेह मिटाने के लिए कवि सोचता है और प्रश्न करता है-लगता है कि तू इस दुनिया का नहीं है। कहीं तू दूसरे ग्रह से आया प्राणी अर्थात एलियन तो नहीं?

कवि सलाह देते हुए आगे कहता है कि तू परागन में, बागन में से बाहर निकल कर डिजिटल दुनिया की तरफ कदम बढ़ा। अपनी क्यारिन में, कलिल को एक तरफ पटक और वर्तमान की आभासी दुनिया में एंट्री मार। क्या तुझे इतना भी नहीं पता कि वसन्त ने पिछले कुछ वर्षों से अपना पता बदल लिया है? अब वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं मिलता। इसका मतलब तो यही हुआ कि तुझे कुछ भी खबर नहीं है। तब कवि धिक्कारता हुआ कहता है कि हे कमबुद्धि! तू कब दिल के बजाय दिमाग से काम लेगा।

कवि आगे राह बतलाते हुए कहता है-हे मूढ़मति मनुष्य! अगर तुझे वास्तव में वसन्त को ढूंढना ही है तो उसका रास्ता एकदम ईजी है। बजाय इधर-उधर टापे खाने के सीधे-सीधे भगवान गूगल की शरण में जा। फेसबुक पर ढूंढ, ट्विटर पर ढूंढ। वहां जाकर वसंत टाइप करके सर्च मार। वहां से तुझे फटाक से वसन्त के असंख्य ठिकाने मिलेंगे। इन ठिकानों पर विजिट करके अपनी इच्छा अनुसार वसन्त के साथ इंजॉय कर।

कवि फिर भेद की बात उजागर करता हुआ कहता है-एक राज की बात और सुन। आजकल वसन्त केवल बसन्त ऋतु में ही नहीं आता बल्कि वह पतझड़ में भी आ सकता है। और तो और वसन्त को कभी भी “डाउनलोड” किया जा सकता है। वसन्त को अच्छी सी फाइल बना कर बड़ी आसानी से ‘सेव’ भी किया जा सकता है।

कवि आगे कहता है-हे जड़बुद्धि मनुष्य! अगर बसन्त के स्थाई ठिकाने को देखना है तो पानन में, पलासन में, को छोड़कर नेताओं, बड़े-बड़े अफसरों के यहां, बड़े-बड़े व्यापारियों के यहां भ्रमण कर। वहां तुझे असली बसन्त के पूर्ण यौवन रूप के दर्शन होंगे। बसंत उनके बड़े-बड़े बंगलों के कण-कण में बिखरा हुआ सॉलिड मस्ती कर रहा होगा।

इसके बाद कवि सावधान करते हुए कहता है कि अब जो ठेकेदार बोल रहा है, उसे कान खोल कर ध्यान से सुन। यह बरसों पुराने द्वार में, दिसान, देस देसन में वसन्त की रट छोड़। अड़ंगा न डाल। इन जगहों पर शापिंग मॉल, हुक्का बार, बीयर बार, मल्टी, टाऊनशिप बनने दे। यही आगे चलकर थारे वसंत के स्थाई अड्डे होंगे। ज्यादा चें-चें मत कर ...!!!

मित्रो, इसके आगे जाकर ऋतु वर्णन की कविता समाप्त हो जाती है। इसके आगे जो लिखा गया वह कोमल कविता नहीं है। बल्कि एक्शन, सस्पेन्स, थ्रिल और हारर है।  

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