सोनू ने कहा, ‘अगर मेरी मां ने बर्तन मांजते हुए हार मान ली होती, तो आज यह पुरस्कार मेरे हाथ में नहीं होता। इस पुरस्कार पर मेरा नहीं, मेरी मां का अधिकार है’, और यह कहते हुए उसने अपना वह पुरस्कार अपनी मां के हाथों में सौंप दिया। लोगों ने देखा, एक अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद्, कुलपति अपनी मां के पांव छू रहा है। रत्ना की आंखों से आंसू नहीं, बरसों की तपस्या बह रही थी।
दीपावली के कुछ ही दिन बाकी रह गए थे पटाखा बनाने वाली फैक्टरियों में रात-दिन पटाखे बनाये जा रहे थे। इसी बीच शहर की एक पटाखा फैक्टरी में पटाखे बनाते हुए जोरदार धमाका हुआ और उसमें पांच लोगों के चीथड़े उड़ गए। दीपावली से पहले ही पांच घरों में अंधेरा हो गया था। इन्हीं पांच लोगों में दर्शन लाल भी था।
दर्शन के परिवार में घर चलाने वाला कोई दूसरा नहीं था। उसकी 28 वर्षीय पत्नी रत्ना और चार बरस का सोनू। रत्ना की आंखों के आगे ही नहीं, जीवन में भी अंधेरा छा गया था। कुछ लोगों ने रत्ना को नया जीवन शुरू करने के लिए दूसरा विवाह करने की सलाह दी, लेकिन रत्ना ने साफ इनकार कर दिया। दर्शन और रत्ना एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। वह गरीब थे लेकिन प्यार की दौलत उनके पास बेशुमार थी। रत्ना को लगता कि दर्शन कहीं उसके आसपास है। वह उसे अपनी सांसों में, अपने ख्यालों में, हवा में और अपने एक कमरे के छोटे से घर में अपने साथ, अपने पास महसूस करती। उसके पास दर्शन की निशानी थी, चार बरस का सोनू। दर्शन कहा करता था उसे कितनी ही मेहनत क्यों न करनी पड़े वह सोनू को पढ़ा-लिखा कर एक बड़ा अफसर बनाएगा।
रत्ना ने दर्शन के सपने को पूरा करने का संकल्प लिया। लेकिन यह संकल्प वह कैसे पूरा करे, उसने ठाना वह नौकरी करेगी। नौकरी तलाश करने कस्बे में निकली तो लोगों की नजरों के शूल उसकी देह में गड़ गए। उसकी समझ में आ गया वह ऐसे भेड़िया समाज में नौकरी नहीं कर पायेगी। एक तरफ अपने पेट की आग, दूसरी तरफ सोनू का पालन-पोषण और साथ में दर्शन के सपने को पूरा करने का संकल्प। सोनू को सीने से चिपका कर लेटती तो उसकी अधखुली आंखों में दर्शन आ जाता। वह उसे अपने पास देखकर जार-जार रोती, तुम मुझे अकेला क्यों छोड़ गए दर्शन, सोनू को अब बड़ा अफ़सर कौन बनाएगा, मैं अकेले तुम्हारा सपना कैसे पूरा करूंगी?
दर्शन उसे भरोसा देते हुए कहता रत्ना तुम अकेली नहीं हो, मैं तुम्हारे साथ हूं। देखना एक दिन पूरी दुनिया तुम्हारे संघर्ष की कहानी लिखेगी, तुम्हारी साधना को नमन करेगी, तुम दूसरी महिलाओं के लिए आदर्श बनोगी। तुम कमजोर नहीं हो, सशक्त रत्ना हो। महिला सशक्तीकरण की मिसाल! रत्ना, सोनू के रूप में समाज को तुम एक ऐसा रत्न देने वाली हो, जो बहुत कीमती होगा, समाज के लिए भी और राष्ट्र के लिए भी। दर्शन से संवाद के बीच उसकी आंख खुलती तो उसकी साड़ी का सारा पल्लू आंसुओं से भीग चुका होता। ऐसा रह-रहकर बार-बार होता और रत्ना नयी ऊर्जा के साथ अपने आप को आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करती। हालांकि, वह दसवीं पास थी, पर दसवीं पास को कोई क्या काम देता और देता भी तो...।
रत्ना ने सोचा वह अपने मायके जाकर सोनू को पालेगी और दर्शन के संकल्प को पूरा करेगी। लेकिन मायके में भी रोटियों के लाले थे। उसकी मां एक कपड़ा फैक्टरी में अपने पति के साथ ही नौकरी करती और जैसे-तैसे अपने घर का खर्च चलाते। रत्ना को लगा कि वह और सोनू यदि वहां रहे तो वे दोनों उनका बोझ बन जायेंगे। रत्ना कुछ दिन मायके रहकर वापस अपने घर लौट आई। हालांकि, मां-बाप ने रत्ना को बहुत रोका। बेटी! हम दोनों आधी-आधी खा लेंगे और आधी-आधी तुम दोनों को खिला देंगे। इस मासूम को लेकर तू कहां कैसे रहेगी, यह दुनिया बहुत स्वार्थी और जालिम है तू अकेली कैसे सबका मुकाबला करेगी? लेकिन रत्ना मां-बाप की बेबसी जानती थी। उसने अपनी मां को भरोसा दिया-‘मां मैं तुम्हारी बेटी हूं, मैं संघर्ष कर लूंगी, मैं सब संभाल लूंगी, तुम चिंता न करो, बस अपना आशीर्वाद मुझे दो।’ मां को आश्वस्त कर रत्ना वापस अपने उस छोटे से घर में लौट आयी। उसी घर में जहां उसके दर्शन की मीठी यादें थीं, और थी उसके दर्शन की खुशबू।
रत्ना के घर के पास ही रहने वाली सावित्री का पति भी मजदूरी करता था। उसके पांच बच्चे थे चार बेटियां और सबसे छोटा एक बेटा। बेटे की आस में ही चार बेटियां घर में आ गयी थी। कहते हैं ना बेटा ही वंश चलाता है, बस यही सोचकर एक के बाद एक...। लेकिन इस पर भी सावित्री और उसके पति को चार बेटियां होने का कोई मलाल नहीं था, भगवान से कोई शिकायत नहीं थी। सावित्री कहती, सब अपना भाग्य लेकर आते हैं। लड़कियां भी होनहार निकल जाएं तो मां-बाप का नाम इतिहास में लिखवा देती हैं और बेटा नालायक निकल जाए तो मां-बाप समाज में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। हां, घर का खर्च ठीक से चलता नहीं था, इसलिए सावित्री तीन-चार घरों में चौका-बर्तन कर घर की व्यवस्था को ढर्रे पर लाने की कोशिश करती।
रत्ना ने एक दिन सावित्री के सामने अपनी व्यथा व्यक्त की तो सावित्री ने अपना दुःख साझा करते हुए उसे सुझाया कि यदि वह चाहे तो वह उसे दो-तीन घरों का काम दिला सकती है। रत्ना, पहले तो झिझकी लेकिन इसे ही नियति मानकर घरों में चौका-बर्तन करने लगी। लेकिन सिर्फ पेट पालना ही उसका मकसद नहीं था। उसे दर्शन का संकल्प पूरा करना था। काम-धंधे से जो समय बचता उसमें वह सोनू को पढ़ाती। पढ़ाने के लिए न तो उसके पास किताब थी, न कलम और न कॉपी। वह पास की एक झाड़ी से लकड़ी की छोटी-सी डण्डी लेकर उसे कलम बनाती और कच्ची धरती को सलेट। वह मिट्टी में लिख-लिखकर सोनू को अक्षर ज्ञान कराती। सोनू पर बचपन से ही मां सरस्वती की अनुकंपा थी। वह इतना होशियार और प्रतिभाशाली था कि जो उसे एक बार बता दिया जाता वह उसके मस्तिष्क में स्थायी रूप से बैठ जाता, उसे दोबारा बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
रत्ना के काम पर जाने के बाद सोनू अकेला रह जाता। उसके घर के पास ही एक प्राइमरी स्कूल था। स्कूल की इमारत जर्जर होने के कारण मास्टर जी पेड़ के नीचे खुले में ही बच्चों को क्लास लगाकर पढ़ाते। सोनू वहीं कुछ दूर एक पत्थर पर जाकर बैठ जाता और मास्टर जी जो बोर्ड पर लिखते वह उसे लकड़ी की डण्डी से जमीन पर लिखकर याद करता। एक दिन मास्टर जी की नजर उस पर पड़ी तो उन्होंने पास आकर देखा कि जो उन्होंने बोर्ड पर लिखा है वह उसने जमीन पर लिख रखा है। बच्चे की प्रतिभा देख मास्टर मुरलीधर हतप्रभ रह गए।
मास्टर जी ने सोनू से कहा, स्कूल में दाखिला क्यों नहीं ले लेता?
सोनू का सहज और छोटा से उत्तर था-मां के पास पैसे नहीं है।
क्या करते है तुम्हारे मां-बाप ? मास्टर जी का दूसरा सवाल था।
‘मां घरों में काम करती है, बाप नहीं है’। सोनू ने मास्टर जी को बताया।
मास्टर मुरलीधर अनुभवी भी थे और दयालु भी। बच्चे की प्रतिभा और उसकी मजबूरी का उन्हें अहसास हो गया था। उन्होंने सोनू से कहा कि कल से यहां पत्थर पर नहीं क्लास में वहां आकर बैठा कर। तुझे फीस नहीं देनी है। किताब-कॉपी तुझे मैं दिलाऊंगा।
मास्टर मुरलीधर का यह वाक्य सोनू के जीवन में ऐसे उतरा, जैसे सूखी धरती पर पहली बरसात। ‘कल से पत्थर नहीं, क्लास में बैठेगा’, यह सिर्फ़ जगह बदलने का आदेश नहीं था, यह किस्मत की करवट थी।
सोनू डरते-डरते अगले दिन स्कूल पहुंचा। फटे कपड़े, नंगे पांव और आंखों में अनजाना संकोच। बाकी बच्चे नई कॉपियों और टिफ़िन की खुशबू में डूबे थे, और सोनू अपनी मां के पसीने की गंध लेकर आया था। लेकिन कहते हैं ना ‘हीरे को परखने के लिए चमक नहीं, आंख चाहिए।’ मुरलीधर मास्टर के पास वह आंख थी।
रत्ना को जब पता चला कि सोनू स्कूल में बैठ रहा है, तो उसने उस दिन चौका-बर्तन करते हुए भी बार-बार आंख पोंछी। बर्तन मांजते-मांजते उसे लगा, जैसे वह अपने भाग्य की कालिख रगड़ रही हो। वह मन ही मन बुदबुदाई, ‘दर्शन, देख रहे हो न? तुम्हारा सपना अब स्कूल जा रहा है।’
समय किसी का इंतज़ार नहीं करता, लेकिन मेहनत करने वालों के साथ कदम मिलाकर चलता है। सोनू कक्षा में अव्वल आने लगा। किताबें उसकी सहेली थीं और सवाल उसका खेल। मास्टर मुरलीधर कहते—
‘यह लड़का नहीं पढ़ता, पढ़ाई इसे पढ़ती है।’
पांचवीं के बाद सरकारी स्कूल छूट गया। आगे की पढ़ाई की दीवार फिर खड़ी हो गई। रत्ना की कमर अब पहले से ज्यादा झुक गई थी। चौका-बर्तन से लौटते हुए उसके हाथ कांपते थे, लेकिन इरादे नहीं। कहते हैं ‘मां की हिम्मत के आगे पहाड़ भी रास्ता छोड़ देते हैं।’
सोनू ने आठवीं में ट्यूशन पढ़ाने का सोचा। पहले-पहले दो बच्चे आए, फिर चार, फिर आठ। वह खुद दसवीं की तैयारी करता और दूसरों को पांचवीं-छठी पढ़ाता। उसकी आवाज़ में मां की तपस्या थी और आंखों में बाप का सपना।
दसवीं पास की, पूरे कस्बे में पहला स्थान आया। उसी दिन उसने मां से कहा,
‘अब आप कहीं काम पर नहीं जाएंगी।’
रत्ना चौंक गई,
‘तो चूल्हा कैसे जलेगा बेटा?’
सोनू मुस्कुराया, ‘अब मेरी पढ़ाई ही चूल्हा जलाएगी।’
उस दिन रत्ना ने पहली बार सुकून की रोटी खाई।
उसने सोनू के सिर पर हाथ रखकर कहा, ‘तू सिर्फ़ मेरा बेटा नहीं, अपने बाप का अधूरा संकल्प है।’ इंटर तक पहुंचते-पहुंचते सोनू की ट्यूशन में भीड़ लगने लगी। अमीर बच्चों के साथ-साथ वे बच्चे भी आते जिनके घरों में किताब से ज्यादा तंगी थी।
जो फीस नहीं दे पाते, सोनू उनसे बस एक वादा लेता, ‘जब काबिल बनोगे, किसी और का हाथ थाम लेना।’
‘दीया अपने लिए नहीं, अंधेरे के लिए जलता है’, सोनू का जीवन इस कहावत की मिसाल बनता जा रहा था।
कॉलेज, फिर यूनिवर्सिटी। छात्रवृत्ति, मेहनत और ईमानदारी, तीनों ने उसका साथ दिया। प्रोफेसर बना तो भी सादगी नहीं छूटी। कुलपति बना तो भी आंखों में वही झोपड़ी और मिट्टी की स्लेट थी।
पहला भाषण देते समय उसने कहा, ‘मैं उस मां का बेटा हूं, जिसने धरती को मेरी स्लेट और लकड़ी की डण्डी को मेरी कलम बनाया। मैं आज जो हूं अपनी मां के कारण हूं। मैं अपनी मां की साधना का प्रतिफल हंू।’ सभागार सन्न रह गया।
उसने उन सभी बच्चों को बुलाया, जिनकी कभी उसने मदद की थी। सबने मिलकर आर्थिक रूप से कमजोर व असहाय बच्चों को आगे बढ़ाने का एक संकल्प लिया। सबने मिलकर एक ‘बुक-कोष’ और एक ‘सहायता कोष’ बनाया, जहां किताबें भी थीं और सपने भी।
यह पहल देश की सीमा लांघ गई। दुनिया ने उस बेटे को सलाम किया, जिसने गरीबी को बहाना नहीं, सीढ़ी बनाया।
अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार लेते समय सोनू ने मंच पर मां को बुलाया। सोनू ने कहा, ‘अगर मेरी मां ने बर्तन मांजते हुए हार मान ली होती, तो आज यह पुरस्कार मेरे हाथ में नहीं होता। इस पुरस्कार पर मेरा नहीं, मेरी मां का अधिकार है’, और यह कहते हुए उसने अपना वह पुरस्कार अपनी मां के हाथों में सौंप दिया। लोगों ने देखा, एक अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद्, कुलपति अपनी मां के पांव छू रहा है। रत्ना की आंखों से आंसू नहीं, बरसों की तपस्या बह रही थी। कहते हैं ‘जिस घर में मां का संघर्ष पूजा बन जाए, वहां बेटा इतिहास बनता है।’
दीपावली की उसी रात, रत्ना ने दीया जलाते हुए आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा,
‘दर्शन, तुम्हारा सपना अब रोशनी बन गया है।’
कुछ लोग पटाखों में जल जाते हैं, और कुछ उसी राख से उजाला रच देते हैं।
