उत्तर आधुनिकता दौर से आगे के संंबंधों का अक्स : The Dainik Tribune

पुस्तक समीक्षा

उत्तर आधुनिकता दौर से आगे के संंबंधों का अक्स

उत्तर आधुनिकता दौर से आगे के संंबंधों का अक्स

मनमोहन सहगल

कनाडा वासी निर्मल जसवाल हिन्दी साहित्य में उत्तर-आधुनिकता का संकल्प इस सीमा तक ले आई हैं कि भारतीय संस्कारों के पाठक को उनकी रचना में खो-सा जाने की अनुभूति होने लगती है। रेड वाइन और ग्रीन-टी को तथाकथित प्रलोभन की सीमाओं से हटा कर देशी और विदेशी घोषित करते हुए लेखिका ने अपने किरदारों को विदेशों में भटकाने, ‘गर्लफ्रेंड ब्वाॅय-फ्रेंड’ की आधुनिक परिभाषाओं में झुठलाने की आरसी पकड़ा रखी है। नगीना हो, या लीना; चन्द्र या अनुज या विशाल सबके चरित्रों को भरमाकर कश्मीरन-भोपाली से बोस्टन, एडमिंटन की दूर-दराज़ जगहों पर पहुंचा कर लिव-इन-रिलेशन में रहते ही नहीं दिखाया, बल्कि ऐसी स्थिति के प्राकृत परिणाम को झेलते और सिर की धूल की तरह झाड़ कर आगे चलते भी दिखाया है। इसको भारतीय दृष्टि शायद अस्वीकार भी करे, परन्तु लेखिका को इससे कोई मतलब नहीं। वह समझती है कि आज का लेखन उत्तर आधुनिकता से भी आगे चलेगा, तभी लोगों को विश्वास होगा कि रचयिता विदेशों के भ्रमण में ऊंची उड़ान लगा चुकी है।

रेड वाइन जैसी नशीली जिंदगी आज की युवा पीढ़ी के लिए सुखद और आकर्षक तो है; साथ ही विदेशों की चकाचौंध, देश की कतिपय तंगदिलियों से परास्त होकर युवाओं का विदेश में जाकर पढ़ने से लेकर बस जाने तक की लालसा इतनी प्रगाढ़ हो गई है, जिसे स्वयं लेखिका ने महसूसा है; शायद इसीलिए खुलकर उसी वातावरण के बखिए उधेड़ने की कसम खा ली है-- यह बात अलग है कि उपन्यासांत में देश की याद पुनः आ जाती है, लौटने का ख्याल मन में उमड़ने लगता है।

उपन्यास की उपलब्धि मानव-सम्बन्धों को मनोवैज्ञानिक स्तर पर पहचानने के प्रयास हैं, युवा पीढ़ी का मार्ग-दर्शन नहीं करने की बजाय उसे स्वानुभव द्वारा परिपक्वता की ओर बढ़ाया है। कहते हैं न कि अक्ल बादाम खाने से नहीं आती, ठोकरें खाने से आती है-- उसी लय में लेखिका ने युवा पीढ़ी के लिए यह रास्ता दिखाया है, जिसमें धक्के और ठोकरें तो हैं, किन्तु अनुभव सवाया है। यदि युवा पीढ़ी समझदार हो जाए तो उसकी जीवन-शैली की सच्चाइयां इस उपन्यास में दर्शायी गई कही जा सकती हैं।

सम्भव है कि लेखिका इस पुरुष प्रधान समाज के विरुद्ध ताल ठोक कर आ रही हो और स्त्री की शक्ति और क्षमता उसके खुली दुनिया में किए जाने वाले सफल संघर्ष एवं सफलता तथा प्रगति की कल्पना प्रस्तुत करके पुरुष को चुनौती देने का कार्य हो। आज के युग में शायद इसकी आवश्यकता भी है, परन्तु यौन के क्षेत्र में युवा पीढ़ी को संयत रखने की आवश्यकता है। ‘रेड वाइन ज़िंदगी’ की लेखिका ने बदलती जीवनशैली, अनियंत्रित सिमटती स्थितियों को बेबाकी से प्रस्तुत किया है, खुलकर जीवन का प्रत्येक आयाम प्रदर्शित किया है, कथा-सूत्रों से भी बेपरवाही और अनियंत्रित सहजता को अपनाया गया है।

उपन्यास भाषा, भाव तथा अभिव्यंजना में सशक्त रचना कही जा सकती है, हां-न का अधिकार बावेला भारतीयता-अभारतीयता की सीमा-रेखाओं के कारण हो सकता है। उत्तर आधुनिकता की रचना-शैली उत्साहजनित है, उपन्यास का पाठ नि:संदेह बड़ा रोमांचक और चुनौतीपूर्ण है।

पुस्तक : रेड वाइन ज़िंदगी लेखिका : निर्मल जसवाल प्रकाशक : आधार प्रकाशन, पंचकूला पृष्ठ : 136 मूल्य : रु. 300.

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