दिखावा : The Dainik Tribune

कहानी

दिखावा

दिखावा

चित्रांकन : संदीप जोशी

डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

जाने क्या हुआ कि दो ही घंटों में जैसे दुनिया बदल गई है। थोड़ी देर पहले ही तो खुद मैंने अपने ही कानों से डॉ. वर्मा को यह कहते सुना था- ‘अरे यार! साला तिकड़मी है ये शर्मा! हर जगह अड्डे जमा रखे हैं इसने। अखबार का चक्कर चलाकर साले ने कई मिनिस्टरों तक से जुगाड़ फिट कर लिया है, वरना इसे पूछता ही कौन है?’

वो तो हुआ यूं कि अचानक ही प्रोफेसर सिन्हा की नज़र मुझ पर पड़ गई थी, इसीलिए मेरी ‘खूबियों’ का यह बखान बंद करके डॉ. वर्मा ने अपने चेहरे पर कोलगेटी मुस्कान का खोल चढ़ा लिया था। बड़ी ही आत्मीयता से डॉ. वर्मा बोले थे मुझसे- ‘कहो भाई डॉ. शर्मा जी! कब खिला रहे हो मिठाई हमें? ...दोस्त, अब तो प्रिंसिपलशिप पक्की ही है आपकी।’ और प्रोफेसर सिन्हा के हाथ पर हाथ मार कर डॉ. वर्मा ने जोरों से ठहाका लगाया था।

मुझे भी यह तो पता था ही कि डॉ. वर्मा ने भी प्रिंसिपलशिप के लिए उच्च शिक्षा आयोग में एप्लाई किया हुआ है और पूरा ज़ोर भी लगा रहे हैं। कई मित्रों से तो वे यहां तक कह चुके हैं कि इस बार शर्मा के चांसेज तो सिलेक्शन के बहुत ही कम हैं। इस समय भी अगर प्रोफेसर सिन्हा की नज़र मुझ पर न पड़ी होती और उन्होंने डॉ. वर्मा को पांव न मार दिया होता, तो डॉ. वर्मा मेरे चरित्र का ‘पोस्टमार्टम’ तो कई बार कर चुके होते।

यह सब दो घंटे पहले ही हुआ है।

और अब... ऐसा लग रहा है कि जैसे डाकिया मेरे नाम जो रजिस्ट्री दे गया है, उसमें ‘प्रिंसिपल-पद’ पर मेरे चुने जाने की सूचना मात्र ही नहीं थी, बल्कि मेरे चरित्र, मेरी क्षमता, मेरे शील-स्वभाव और सबसे बढ़कर मेरी विद्वत्ता का प्रमाण पत्र भी था।

पूरे कॉलेज में अनायास खलबली-सी मच गई।

एक बारगी तो मुझे भी ऐसा ही लगने लगा कि प्रिंसिपलशिप के इंटरव्यू में सफल होकर जैसे मैंने ‘एवरेस्ट’ को ही जीत लिया है।

तपाक से डॉ. वर्मा ने मुझे गले लगाया और बड़ी ही आत्मीयता भरे स्वर में बोले- ‘अरे... मैं तो प्रोफेसर सिन्हा साहब से कह ही रहा था कि डॉ. शर्मा जी हमारे कॉलेज की ही नहीं, पूरी यूनिवर्सिटी की शान हैं। कमाल कर दिया भाई! पूरे जिले में केवल आप ही का चयन हुआ है शर्मा साहब! ...मैनी. ..मैनी कांग्रेच्यूलेशन्स।’

मैंने उच्च शिक्षा आयोग से आया लिफाफा एक बार फिर से खोल कर देखा, सचमुच मेरा चयन प्रिंसिपल के पद पर होने की सूचना ही उसमें थी। मैं एक ही सांस में पूरी लिस्ट पढ़ गया, लेकिन उसमें डॉ. वर्मा का नाम कहीं नहीं मिला, तो मैं पूछ ही बैठा- ‘अरे... ये क्या हुआ वर्मा जी? ...आपका नाम... तो...?’

और, तपाक से मेरी बात काटते हुए डॉ. वर्मा ने मुंह की सारी कड़वाहट ही जैसे उगल दी- ‘अरे भाई! अपने साथ भला मिनिस्टरों का ज़ोर थोड़े ही था...।’

मुझे एकाएक डॉ. वर्मा की बात सुनकर अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन मैं चुप हो गया, लेकिन मेरे पास ही खड़ी डॉ. सरिता ने चुटकी लेते हुए पूछ ही लिया- ‘लेकिन वर्मा जी! थैली तो आपकी काफी भारी थी न? ...फिर क्या हो गया? ...आप तो कह रहे थे कि इस बार तो आपका सिलेक्शन खुदा भी नहीं रोक सकता।’

खिसियाए हुए डॉ. वर्मा ने सिर्फ इतना ही कहा- ‘डॉ. सरिता जी! ...आप तो कम-से-कम वक्त देखकर बोलना सीखिए कभी!’

और, वे झल्लाए हुए वहां से चले गए।

तभी हमारे कॉलेज का चपरासी रामदीन आया। मुझे लगा कि उसके व्यवहार में आज एकदम बदलाव आ गया है। मुझसे बोला-‘साहब! मिठाई तो हम भी खाएंगे आपके दौलतखाने पर आकर। ...अभी तो प्रिंसिपल साहब आपको दफ्तर में याद कर रहे हैं।’

मैंने देखा कि कई प्रोफेसर साथी लाइब्रेरी की तरफ ही चले आ रहे हैं। आते ही प्रोफेसर शुक्ला ने बड़े तपाक से मुझसे हाथ मिलाया और मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही गद‍्-गद स्वर में शुक्ला जी बोल उठे- ‘यार, कमाल कर दिया डॉ. शर्मा जी आपने तो! मैं तो कल ही वर्मा जी से कह रहा था कि डॉ. शर्मा तो जीनियस हैं। प्रिंसिपलशिप तो क्या है, एक दिन हमारे शर्मा जी को तो वाइस चांसलरशिप भी मिलेगी।’...और, सबके साथ खी-खी करके शुक्ला जी बड़ी देर तक हंसते रहे।

और मैं... एक क्षण को खो गया यादों के घने जंगल में, जहां डॉ. शुक्ला जी के शब्द चारों ओर नुकीले कांटों की तरह उगे हुए थे। चार दिन पहले की ही तो बात है जब प्रोफेसर शुक्ला और डॉ. वर्मा फील्ड में खड़े थे और शुक्ला जी फरमा रहे थे- ‘अरे यार! हायर एजुकेशन कमीशन कोई हंसी-मज़ाक तो है नहीं कि हर लल्लू-पंजू वहां फार्म भर दे और पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज का प्रिंसिपल बन जाए? ...और, इस शर्मा के पास है ही क्या? ...डॉ. वर्मा, आप आफीशिएट कर चुके हो बारह वर्ष तक, जबकि यह शर्मा तो प्रिंसिपलशिप की ए.बी.सी. तक नहीं जानता। भैया रे! हम कोई भाड़ नहीं झोंकते यहां, हमने भी दुनिया देखी है...।’

तब, डॉ. वर्मा बड़ी ही कुटिलता से मुस्कुरा दिए थे, जैसे ही प्रोफेसर शुक्ला की निगाह मुझ पर पड़ी तो खीसे निपोरते हुए बड़ी बेशर्मी से व्यंग्य के स्वर में बोले-‘आइए... आइए... प्रिंसिपल साहब! पधारिए।’ और फील्ड में खड़े डॉ. वर्मा के साथ शुक्ला जी ने बड़े जोरों का ठहाका लगाया था।

‘अरे भाई शर्मा साहब! ...कहां खो गए हो भैया?...प्रिंसिपल बन कर हम गरीबों को भूल मत जाना, भाई!’ प्रोफेसर शुक्ला मेरा हाथ पकड़े हुए आत्मीयता की साकार प्रतिमा बने कह रहे थे मुझसे। वहां खड़े अन्य साथियों ने भी बधाइयां दी और मुझे लगा कि दो ही घंटों में जैसे दुनिया भर के चुम्बक मुझमें लग गए हैं। हर कोई जैसे खिंचा चला आ रहा है बधाइयां देने।

मैं लाइब्रेरी से चलकर प्रिंसिपल साहब के दफ्तर में आया तो देखा कि पिछले तीन वर्षों से मुझे हर तरह से मिटा देने पर तुले हुए प्रिंसिपल साहब ने अपनी सीट से खड़े होकर मेरा स्वागत ही नहीं किया, बल्कि आगे बढ़कर मेरा हाथ अपने हाथों में बहुत जोर से कस कर पकड़ते हुए बोले-‘कांग्रेच्यूलेशन्स डॉ. शर्मा साहब! ...वैलडन ...वैरी वैलडन।’

सच कहूं, प्रिंसिपल साहब को देखकर मैं मन ही मन बुरी तरह झुंझला उठता था, क्योंकि उन्होंने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए पूरे स्टाफ को ही टुकड़ों में बांट दिया था और सबको आपस में लड़ा रखा था, लेकिन आज लग रहा था कि अभी-अभी रजिस्ट्री से मिले, प्रिंसिपल पद पर नियुक्ति पत्र का जादू मुझ पर भी चढ़ने लगा था। मैंने आगे बढ़कर प्रिंसिपल साहब के पांव छू लिए तो प्रिंसिपल साहब ने मुझे गले लगा लिया और गद‍्-गद स्वर में बोले- ‘भाई! बहुत बहुत बधाइयां! मुझे तो सैन्ट परसैन्ट उम्मीद थी आपके सिलैक्शन की। सच मानिए, आपने तो हमारा और इस कॉलेज का नाम रोशन कर दिया है।’

और, मैं एक बार फिर से खो गया यादों के उसी कंटीले जंगल में और चुभने लगे नुकीले तीरों की तरह बार-बार सुने हुए शब्द मेरी रग-रग में।

कई साथी प्रोफेसरों के बीच, पिछले ही सप्ताह प्रिंसिपल साहब ने स्टाफ रूम में मुझसे पूछा था कि मेरा इंटरव्यू कैसा हुआ है, तो उत्साह में भरकर मैंने सब बता दिया था। तब डॉ. वर्मा की ओर बड़ी अर्थ भरी निगाह से देखते हुए, इन्हीं प्रिंसिपल साहब ने फरमाया था- ‘डॉ. शर्मा! आप नहीं जानते कि इंटरव्यू तो सिर्फ दिखावा होता है, सिलैक्शन होना दूर की बात है।’ ...और, कई मुंहलगों ने तुरंत हंसकर प्रिंसिपल साहब का समर्थन करते हुए मुझे दया के भाव से देखा था। सच कहूं, उस समय तो अपनी घोर उपेक्षा देखकर मैं रोने को ही हो आया था।

और अब... सब कुछ बदल गया है जैसे।

प्रिंसिपल साहब मेरा हाथ पकड़े-पकड़े ही बोले- ‘भाई! मेरी कुर्सी आप संभालते तो सच मानिए, मुझे और खुशी हुई होती। सुना है...’

मैं तभी बोल पड़ा- ‘जी, हां! सर, मुझे अपना कॉलेज नहीं मिल पाया है। काफी दूर का कॉलेज दे दिया है कमीशन ने मुझे। ...समझ नहीं पा रहा हूं कि ऐसे में क्या करूं?’ तभी चहकते हुए प्रिंसिपल साहब तुरंत बोल पड़े- ‘अरे भाई! इसमें भला कैसा सोचना? बहुत बढ़िया और बड़ा कॉलेज मिल गया है आपको तो। दो ही साल में वारे-न्यारे हो जाएंगे। ...सोचिए-वोचिए कुछ मत ...तुरंत जाकर ज्वाइन कीजिए। यू आर मोस्ट लक्की।’

मैंने कृतज्ञता अनुभव करते हुए कहा- ‘सर, मैं आज परीक्षा में ड्यूटी नहीं कर पाऊंगा। ...मुझे आप छुट्टी दे दें तो बड़ी कृपा हो।’

बेहद अपनत्व और उदारता दिखाते हुए प्रिंसिपल साहब तपाक से बोल पड़े- ‘अरे... अरे! बड़े शौक से घर जाइए डॉ. शर्मा! यहां सब मैनेज हो जाएगा। डोंट वरी। अरे भाई, अब तो आप भी प्रिंसिपल ही हैं, लाइक मी।’

मेरे दिमाग पर भी जैसे नशा-सा छाता जा रहा था। स्टाफ रूम में पहुंचा, तो हर तरफ से बधाइयां ही बधाइयां मिलने लगीं। मेरी नज़र तभी डॉ. वर्मा पर पड़ीं तो देखा कि वे चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे। मुझे लगा कि मेरे ऊपर भी विनम्रता का एक अजीब-सा खोल अनायास ही चढ़ गया है। मैं धीरे से गया और डॉ. वर्मा के पास बैठ कर बड़ी ही आत्मीयता से बोला -‘डॉक्टर साहब! यह क्या हो गया है? आपका तो इंटरव्यू बहुत ही बढ़िया हुआ था... मैं तो, सच मानिए, कुछ भी नहीं हूं आपके सामने। ...समझ में नहीं आता, ...क्या हो गया है?’

डॉ. वर्मा के चेहरे पर विद्रूपता उतर आई।

ज़हर-सी तीखी कड़वाहट उगलते हुए डॉ. वर्मा बोले - ‘अरे यार! काहे का साला इंटरव्यू? जहां नोटों की गड्डियां और मिनिस्टरों की सिफारिशें चलती हों, वहां योग्यता भला किस खेत की मूली है?’

मेरे तन-मन में आग-सी लग गई थी। कोई और वक्त हुआ होता तो मैं ईंट का जवाब पत्थर से ही देता, लेकिन आज मुस्कुराते हुए चुप रह गया।

विनम्रता का जादू मेरे ऊपर भी चढ़ चुका था।

घर पहुंचा तो देखा कि आस-पड़ोस की कई औरतें, बच्चे और पड़ोसी जमे हुए हैं। मेरी पत्नी और बच्चे, सभी जैसे हवा में उड़ रहे हों। मेरा स्वागत ऐसा हुआ, जैसे दूल्हे का होता है। मिठाई, दूध-चाय, फल और जाने, क्या-क्या था, जो मेरी पत्नी बधाइयां देने वालों को खुशी-खुशी दौड़-दौड़ कर खिला-पिला रही थी।

मुझे लगा, दुनिया दो-तीन घंटों में पूरी तरह बदल गई है। मैंने पत्नी से मुस्कुराते हुए कहा- ‘आज तो श्रीमान प्रिंसिपल साहब भी बधाइयां दे रहे थे? और वो... हरामी...’, तो मेरी बात बीच में ही काट कर पत्नी बोली- ‘अजी, छोड़ो भी। किन मरों की बात लेकर बैठ गए हो? भगवान सब देखते हैं। हमारा किया हमारे साथ, और उनका किया, उनके साथ।’

मैं भौंचक्का-सा अपनी पत्नी को देख रहा था। और कोई मौका हुआ होता, तो पिछले तीन वर्षों के मेरे घोर उत्पीड़न और मानसिक यातनाओं से बुरी तरह त्रस्त मेरी पत्नी प्रिंसिपल साहब को कतई न बख्शती और बुरा-भला जरूर कहती, लेकिन आज तो ऐसा लगा कि वह बहुत बड़ी दार्शनिक हो गई है, जो मुझे भी शांत रहने का उपदेश दे रही थी।

मैंने रजिस्ट्री से आया नियुक्ति-पत्र फिर से देखा। जाने क्यों, ऐसा लग रहा था कि उस पत्र में कोई अजीब-सा नशा है, जो बड़ी ही तेजी से मुझ पर भी छाता जा रहा था।

शाम हो गई, लेकिन आने वाले कम नहीं हुए।

प्रोफेसर खरे अपनी पत्नी के साथ आए और दरवाज़े से ही ऊंची आवाज़ में चहके- ‘मुबारक हो भाभी जी! ...अरे ...कहां छिपा रखा है हमारे प्रिंसिपल साहब को? ...देखिए तो, हम भी दावत खाने आए हैं।’

मैं और मेरी पत्नी स्वागत को तैयार ही थे। मिसेज खरे तो पत्नी से बतियाने लगी और प्रोफेसर खरे बड़ी ही बेतकल्लुफी से ऐसे बोले, जैसे मेरे लंगोटिया यार ही रहे हों-‘देखा... भाई शर्मा! बहुत बड़ा मैदान मारा है आपने तो... वो... उस डॉ. वर्मा को ऐसी जोरदार और यादगार पटखनी दी है कि दिल ग्लैड-ग्लैड हो गया है।’

मैं बड़ी ही विनम्रता से बोला-‘अरे, नहीं खरे साहब। डॉ. वर्मा तो मेरे सीनियर हैं... बड़े ही आदरणीय हैं... ऐसा कुछ नहीं है।’ ऐसा लगा कि प्रोफेसर का तीर खाली कारतूस की तरह फुस्स हो गया है, तो कुछ पल के लिए तो वे उदास हुए, लेकिन फिर पैंतरा बदल कर हंसते हुए चहके- ‘अरे, भाई शर्मा जी! यही तो सबसे बड़ी खूबी है आपकी... वंडरफुल! क्या ग्रेटनेस है भाई? ...हम तो फिदा हो गए आपकी ग्रेटनैस पर।’

चाय पी चुके थे हम सब लोग।

तभी पूरे अधिकार भाव से प्रोफेसर खरे मुझसे बोले- ‘देखिए, शर्मा जी! अभी से कह रहा हूं मैं, यह मकान... तो भई... आप हमें ही देकर जाइएगा।’

मैं चौंक पड़ा प्रोफेसर खरे की बात सुनकर।

जब उनका मतलब समझ में आया तो बहुत ही झुंझलाहट भरी आवाज़ में मैं बोला- ‘यार, खरे जी! ...पैंठ अभी जमी भी नहीं और गिरहकट आ मरे? मैं अभी जा कहां रहा हूं?’

तो, बेशर्मी से खीसे निपोरते हुए खरे जी फिर बोल पड़े- ‘अरे यार, प्रिंसिपलशिप मिल गई है तो क्या इस फटीचर से क्वार्टर को छोड़ोगे नहीं? ...मैं फिर कहे देता हूं कि यह मकान मुझे ही दिलवा कर जाना होगा, चाहे कुछ भी करना पड़े।’

प्रोफेसर खरे बार-बार बधाइयां देकर अभी-अभी चले गए हैं। मेरे हाथ में रजिस्ट्री से आया हुआ प्रिंसिपल पद पर मेरी नियुक्ति होने का नियुक्ति पत्र है, जिसने कुछ ही घंटों में मुझे कुछ-से-कुछ बनाकर जैसे दुनिया ही बदल दी है। मैं खोया-सा खड़ा हूं दूर अंधेरे में ताकता हुआ-सा।

तभी पत्नी बोली- ‘बाहर अंधेरा है, भीतर की रोशनी में आ जाइए।’

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