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विसंगतियों का आईना दिखाती लघुकथाएं

पुस्तक समीक्षा

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वर्तमान में लघुकथा सरल, सहज अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर कलात्मकता तथा साहित्यिक भाषा की मांग करती है।

‘रॉन्ग नंबर’ लघुकथा-संग्रह की लघुकथाएं बिना किसी शिल्प या भाषाई चमत्कार के, सरल भाषा में सहज अनुभूति तथा समाज के यथार्थ का आईना दिखाती प्रतीत होती हैं।

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‘भाषा की पकड़’ में, बिना एक-दूसरे की भाषा जाने कैसे अर्थ का अनर्थ हो जाता है, यही बताया गया है। मालकिन के कहने पर— ‘कपड़े बाहर स्टील के स्टैंड पर डाल दो।’ मेड उस पर रखकर चली गई। ‘कपड़े सुखाए क्यों नहीं?’ पूछने पर कहने लगी— ‘तुम डारे को बोली रही, पसारे को नहीं बोली रही।’

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‘बिकाऊ कोख’ में बच्चों की भूख मिटाने के लिए अपनी कोख के बच्चे को बेचना एक गरीब मां की विडंबना ही कही जाएगी।

‘किन्नर का नजरिया’ में लड़के की मां की पीड़ा तथा व्याकुलता देखकर किन्नर के उस्ताद का कहना— ‘बहन, अगर आप इसे पढ़ा-लिखा कर अच्छा इंसान बनाएंगी तो अपने पास रख लो। मैं भी यही चाहता हूं कि हम लोग भी समाज में सिर ऊंचा करके जी सकें और हममें और आपमें अंतर को पाट सकें।’

आत्मकथात्मक शैली में लिखी ‘एक ही मंज़िल’ लघुकथा में लेखिका का यह वाक्य—‘क्या फर्क पड़ता है, मैं किस रास्ते से चली जाऊं, बस मंज़िल तक पहुंच जाऊं...’ सर्वधर्म-भावना की सीख देता है।

‘दिल का रोगी’ तथा ‘अजूबा’ लघुकथाएं हास्य-पुट लिए हैं। लघुकथा एक गंभीर विधा है; हास्य के लिए इसमें कोई गुंजाइश नहीं—यह हमें समझना होगा।

‘कुत्ते की जूण’ मानवीय संवेदना को झिंझोड़ने वाली तथा विसंगति पर प्रहार करने वाली लघुकथा है, जिसमें घर के नौकर शिब्बू से अधिक कुत्ते को लाड़-दुलार मिलता है और उसे डांट-फटकार। कुत्ते के मर जाने पर जब उसके हिस्से की ब्रेड उसे मिली तो उसे लगा कि सच में उसे कुत्ते की जूण मिल गई है और वह खुशी से गेट पर जाकर भौं-भौं करने लगा।

‘ओटीपी’ तथा ‘खेल-खेल में’ सचेत करती लघुकथाएं हैं। ‘रॉन्ग नंबर’ आजकल की लड़कियों की उच्छृंखलता तथा भारतीय संस्कृति के विपरीत आचरण को दर्शाती रचना है।

समग्रतः ये लघुकथाएं एक-से-बढ़कर-एक समसामयिक विषय लिए समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, किंतु ये केवल जस-की-तस घटनाओं या अनुभूतियों की अभिव्यक्तियां मात्र हैं। इन्हें लघुकथा में ढालने के लिए जिस कलात्मकता तथा व्यंजनात्मक भाषा की दरकार रहती है, उसका अभाव नज़र आता है।

पुस्तक : रॉन्ग नंबर लघुकथाकार : डॉ. वीणा विज 'उदित' प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 250

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