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संवेदना का शेल्टर होम

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक हुई तो मृत्यंुजय ने प्रस्ताव रखा, ‘हम एक ऐसा शेल्टर होम बनाएं, जहां बेसहारा इंसान और बेसहारा कुत्ते, दोनों साथ रह सकें।’ लोग हंसे, पर वह अडिग रहा। उसने आगे समझाया इससे मानव और पशु के बीच संघर्ष की प्रवृत्ति पर विराम लगाने में मदद मिलेगी। दोनों के बीच की यह समझ सकारात्मक रूप में समाज में जायेगी।

कहते हैं ‘जिसे कोई नहीं अपनाता, उसे ईश्वर किसी न किसी रूप में थाम लेता है।’ शेल्टर होम के आंगन में पल रहा वह बालक भी कुछ ऐसा ही था। नाम था, मृत्युंजय। नाम जितना भारी, जीवन उससे कहीं अधिक। जब वह बहुत छोटा था, तभी से उसे कुत्तों और उनके पिल्लों से एक अजीब-सा लगाव था। यह लगाव साधारण नहीं था, यह वैसा था, जैसे कोई अपने ही रक्त को पहचान ले।

शेल्टर होम में बच्चों को जो भोजन मिलता, मृत्युंजय उसमें से थोड़ा-सा बचा लेता। रोटी का एक टुकड़ा, दाल की एक कटोरी, और फिर चुपके से परिसर के उस कोने में चला जाता, जहां कुछ आवारा कुत्ते-कुतियां अपने पिल्लों के साथ रहते थे। वह उन्हें पुचकारता, सहलाता, उनसे बातें करता, मानो वे उसकी भाषा समझते हों। कभी ऐसा लगता मानो वह उनसे किसी अदृश्य नाल से बंधा हो।

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शेल्टर होम व्यवस्थापक मुलखराज कई बार उसे समझाते, ‘बेटा, कुत्तों से दूर रहा करो। बीमार पड़ जाओगे।’ पर मृत्युंजय मुस्कुरा देता। उस मुस्कान में जवाब होता, ‘जिसने मुझे बचाया, उससे मैं कैसे दूर रहूं?’

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वह दूसरे बच्चों को भी प्रेरित करता, ‘अगर तुम्हारा पेट भर गया हो, तो थोड़ा इन्हें भी दे दो। भूख तो भूख होती है, चाहे इंसान की हो या जानवर की।’ मृत्युंजय का कुत्तों के प्रति व्यवहार ऐसा रहता मानो वे उसके परिवार के सदस्य हों। मुलखराज यह सब देख चकित रहते। उन्हें समझ नहीं आता था कि यह बच्चा कुत्तों के प्रति इतना आत्मीय क्यों है?

एक दिन शेल्टर होम में समाजसेवी रतनलाल आए। वही रतनलाल, जो वर्षों पहले इस बच्चे को अनाथ शिशु के रूप में यहां छोड़ गए थे। शेल्टर होेम के बच्चों के बारे में बात चली तो बातों-बातों में मुलखराज बोले, ‘भाई रतनलाल आप जिस बच्चे को छोड़कर गए थे वह बच्चा बड़ा होनहार है, पढ़ाई में तेज है... पर कुत्तों से उसका लगाव असाधारण है।’

रतनलाल की आंखें भर आईं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, ‘क्योंकि यह पिल्लों के बीच पला है। उसे करुणा के रूप में पहली घंूटी एक कुतिया ने ही दी थी।’ यह सुनकर मुलखराज सन्न रह गए। ‘लेकिन आप तो इसे नवजात अवस्था में यहां लाए थे। फिर यह पिल्लों के बीच कैसे पला?’ तब रतनलाल ने जो कथा सुनाई वह ऐसी थी कि पत्थर दिल को भी पिघलाकर मोम बना दे।

रतनलाल बोले, ‘इसकी मां ने इसे जन्म देने के बाद एक खेत में फेंक दिया था। ‘जिसे संसार ठुकरा देता है, उसे कभी-कभी ईश्वर स्वयं उठा लेता है।’

उस रात ईश्वर चार पैरों पर चला था। सर्दी अपनी पूरी क्रूरता के साथ धरती पर उतर आई थी। कुहासा खेतों में पसरा था, हवा में बर्फीली चुभन थी, मौत सिरहाने खड़ी थी। एक नवजात, अभी आंखें पूरी तरह खोल भी नहीं पाया था कि उसे मौत की गोद में फेंक दिया गया। मां ने जन्म दिया था पर मां बन न सकी।

खेत के उस सन्नाटे में एक कुतिया अपने पिल्लों के लिए भोजन की तलाश में भटक रही थी। वह कुछ ही दिन पहले ब्याही थी, मां बनी थी। स्तनों में दूध था, आंखों में ममता। अचानक उसकी नाक फड़की। एक अपरिचित गंध, मानव शिशु की गंध उसे अपनी ओर खींच रही थी। वह रुक गई। चारों ओर सूंघा। कचरे के ढेर के पास एक नन्हा-सा शरीर कांप रहा था। भूख सामने थी, पर करुणा उससे बड़ी निकली।

कुतिया ने बच्चे को सूंघा, चारों तरफ घूम-घूमकर देखा, और फिर वही किया जो शायद बहुत-सी इंसानी मांएं नहीं कर पातीं। उसने बच्चे को अपने मुंह में उठाया, न दांत गड़े, न खरोंच आई। उसे अपने पिल्लों के बीच ले आई। पुराली पर लिटाया, पंजों से कुछ पुराली उसके ऊपर ढककर गर्मी दी और अपने शरीर की गर्मी उसे सौंप दी। कुतिया ने उसे न केवल सर्दी से बचाया, बल्कि उसे चाट-चाटकर अपना प्यार भी उस पर उड़ेलती रही। जिस मां ने जन्म दिया, उसने छोड़ दिया। जिसने जन्म नहीं दिया, उसने जीवन दे दिया।’

उस रात एक कुतिया मां थी, और एक इंसान सिर्फ बच्चा। रतनलाल की आवाज़ कांप रही थी। सुबह जब गांव जागा, तो यह दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं था। सुबह गांव वालों ने देखा, एक कुतिया, अपने पिल्लों के बीच एक मानव शिशु को सहेजे बैठी थी। लोग ठिठक गए। आंखें भर आईं। किसी ने कहा, ‘देखो, जानवर भी इंसानियत जानते हैं।’

‘कहते हैं न, ‘दया धर्म का मूल है।’ उस दिन यह बात सच साबित हुई।’ बच्चे को उठाया गया। कुतिया देर तक उसे देखती रही, मानो कह रही हो, ‘मैंने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब तुम जानो।’ गांव वालों ने बच्चे का नाम रखा, मृत्युंजय। चूंकि वह मृत्यु से जीतकर आया था। कुछ समय तक एक वृद्ध विधवा ने उसे पाला, फिर सबके परामर्श से मैं इसे शेल्टर होम ले आया। मुलखराज सब समझ गए। उन्होंने मन ही मन कहा, ‘भगवान ने इसे बचाया है, तो जरूर उसे इससे कोई बड़ा काम कराना होगा।’

मृत्युंजय बचपन से ही अलग था। उसकी आंखों में किसी खोए हुए रिश्ते की तलाश रहती। मृत्युंजय बड़ा होने लगा। पर उसके मन में सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते—

‘मेरे मां-बाप कौन हैं?’

‘मुझे क्यों छोड़ दिया गया?’

वह शेल्टर होम संचालक मुलखराज से बार-बार पूछता। पर उत्तर में बस यही जवाब मिलता, ‘समय आने पर सब पता चल जायेगा।’ और समय धीरे-धीरे उसे गढ़ने लगा। मुलखराज ने उसे नौवीं कक्षा में बाहर के अच्छे स्कूल में दाखिल कराया। मृत्युंजय ने भी मेहनत को अपना धर्म बना लिया। ‘मेहनत का फल मीठा होता है।’ यह उसने साबित किया। हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी! इंटरमीडिएट में पूरे प्रदेश में पांचवीं रैंक। इसी बीच उसने अखबार में विदेशी विश्वविद्यालय की छात्रवृत्ति के बारे में पढ़ा और ऑनलाइन आवेदन कर दिया। ऑनलाइन परीक्षा दी और भाग्य उसके साथ खड़ा हो गया। परीक्षा में वह टॉपर था।

अब पढ़ाई के लिए विदेश रवाना होना था, लेकिन विदेश जाने का व्यय कहां से आएगा? यह सवाल उसके सामने था। मुलखराज फिर आगे आए और उन्होंने शेल्टर होम व्यवस्था समिति के सामने प्रस्ताव रखा। सर्वसम्मति से तय हुआ और विदेश जाने का खर्च शेल्टर होम समिति ने उठाया।

विदा होने से एक दिन पहले मृत्युंजय व्यवस्थापक मुलखराज के कमरे में गया। उसके चेहरे पर उत्साह भी था और बेचैनी भी। उसने मुलखराज के पैर छुए। फिर पहली बार उसकी आवाज़ कांपी, ‘बाबूजी... कल मैं जा रहा हूं। शायद बहुत दूर, शायद बहुत दिनों के लिए। लेकिन एक प्रश्न मेरे भीतर कांटे की तरह चुभा है। कृपया आज बता दीजिए, मेरे मां-बाप कौन थे? और मुझे यहां क्यों छोड़ दिया गया?’ मुलखराज देर तक चुप रहे।

उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने मृत्युंजय को उठाया, गले लगाया, पास बैठाया और कहा, ‘बेटा, आज नहीं बताऊंगा तो शायद कभी नहीं बता पाऊंगा।’ यह कहते हुए मुलखराज ने वह पूरी घटना दोहरा दी जो रतनलाल ने उन्हें बतायी थी। ‘बेटा, ममता की पहली घूंटी तुम्हें उसी कुतिया ने दी थी।’ यह कहते हुए मुलखराज की आवाज टूट गयी... और मृत्यंुजय! उसके भीतर के प्रश्न आंसू बनकर गालों पर लुढ़क रहे थे। ये आंसू जन्म देने वाली मां की विवशता पर थे या उसे नया जीवन देने वाली उस चार पैरों वाली मां की करुणा के प्रति थे, यह मुलखराज समझ नहीं पाये। लेकिन मृत्युंजय की आंखों में उन्होंने एक दृढ़ संकल्प देखा था।

शेल्टर होम से विदा के समय मृत्युंजय ने शेल्टर होम के आंगन में उन कुत्तों को देखा, उसकी आंखों में आज अपनापन और गहरा हो गया था। वह उन्हें इस तरह निहार रहा था, जैसे मोर्चे पर जाने से पहले कोई जवान अपने परिवार को निहारता है। उसने मन में संकल्प लिया... ‘मैं लौटूंगा... और लौटकर सब बदल दूंगा।’

विदेश में इमारतें ऊंची थीं, पर उसकी यादें उससे भी ऊंची। वह आर्किटेक्चर पढ़ता, पर हर नक्शे में उसे एक आंगन चाहिए होता, जहां इंसान और जानवर साथ बैठ सकें। वह जानता था, इमारतें केवल ईंटों से नहीं, भावनाओं से भी बनती हैं।

वर्षों बाद वह भारत लौटा, एक बड़ा आर्किटेक्ट बनकर। एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिली। मेहनत, ईमानदारी और सकारात्मक दृष्टि के बल पर वह जल्दी ही कंपनी का सीईओ बन गया। पर उसका मन अब भी पुराली, पिल्लों और उस कुतिया की गर्म सांसों में अटका था। कहते हैं ‘कुछ जीवन प्रश्न लेकर जन्म लेते हैं और उत्तर देकर संसार को बदल देते हैं।’ मृत्युंजय ऐसा ही एक जीवन था।

सीएसआर का सही उपयोग कहां और कैसे किया जाए? इस विषय पर कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक हुई तो मृत्यंुजय ने प्रस्ताव रखा, ‘हम एक ऐसा शेल्टर होम बनाएं, जहां बेसहारा इंसान और बेसहारा कुत्ते, दोनों साथ रह सकें।’ लोग हंसे, पर वह अडिग रहा। उसने आगे समझाया इससे मानव और पशु के बीच संघर्ष की प्रवृत्ति पर विराम लगाने में मदद मिलेगी। दोनों के बीच की यह समझ सकारात्मक रूप में समाज में जायेगी।

कंपनी ने उसके प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए शेल्टर होम बनवाया। एक हिस्से में असहाय, वृद्ध, विकलांग लोग। दूसरे हिस्से में आवारा कुत्ते-कुतियां और उनके पिल्ले। बीच में खुला आंगन, जहां इंसान और जानवर एक-दूसरे की आंखों में झांक सकें।

मृत्युंजय रोज सुबह-शाम वहां जाता। थोड़ा समय कुत्तों के बीच, थोड़ा समय उन असहाय लोगों के बीच। वह जानता था, दर्द की भाषा एक होती है। उसके सुझाव पर कंपनी ने अनेक शहरों में ऐसे और भी शेल्टर होम स्थापित किए। सड़क पर घूमने वाले कुत्तों के लिए भोजन और रहने की व्यवस्था हुई। उसके इस जीवदया-प्रेम को देखकर सरकार ने उसे पद्मश्री से अलंकृत किया। सम्मान ग्रहण करते समय उसकी आंखें नम थीं। उसने कहा, ‘अगर उस रात एक कुतिया ने मुझे न बचाया होता, तो आज यह सम्मान नहीं होता। आज जो हूं, उस करुणा की वजह से हूं।’

कहते हैं, ‘जो मिला है, उसे लौटाना ही सच्चा धर्म है।’ मृत्युंजय ने यही किया। उसने जीवन को करुणा का स्थापत्य बना दिया और साबित कर दिया, मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, कभी-कभी चार पैरों पर चलने वाली भी भगवान का रूप होती है।

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