कविता की एक अविरल धारा हर युग में बहती रही है, और लेखकों, साहित्यकारों ने इस धारा के साथ या इसके विपरीत बहने के प्रयास किए हैं। कुछ लेखकों ने जहां समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी रचनाओं का आधार बनाया है, वहीं कुछ लेखकों द्वारा अपने जीवन की आंतरिक यात्रा के दौरान आए पड़ावों से साक्षात्कार करते हुए अपनी रचनाओं को अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है।
‘मैं समय हूं’ दिलीप कुमार पाण्डेय का ताज़ा प्रकाशित काव्य संग्रह है, जिसमें उनकी अड़सठ कविताएं सम्मिलित हैं। मनुष्य के अनुभवों की व्यापकता जितनी बाहरी दुनिया में दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक वह भीतर के संघर्ष, स्मृतियां, आशंका को समेटे होती हैं और उम्मीद में बसती हैं। पुस्तक की रचनाएं इस आंतरिक अनुभव संसार का अत्यंत संवेदनशील मानचित्र हैं।
दिलीप कुमार पाण्डेय ने इस अभिव्यक्ति के दौरान कहीं भी भावुकता या आक्रोश का सहारा न लेकर गहराई से चिंतन करके समाज के भीतर व्याप्त विसंगतियों को पूर्णता के साथ पाठकों को परोसने का साहस किया है। संग्रह की बहुत-सी रचनाओं में उनकी इस दृष्टि के दर्शन होते हैं। उनकी कविता मां और माटी में वर्णित है :-
मां और माटी की/ प्राय: बहस होती है/ नित्य प्रतिदिन/ कहीं दीप जले/ कहीं राग/ तो कहीं संगीत।
संग्रह के शीर्षक के साथ जुड़ी कविता समय रुकता नहीं में वो लिखते हैं :-
समय सच है/ अटल भी है/ इधर-उधर मुड़कर नहीं देखता/ अपनी गति से/ निरंतर चलता रहता है/ जबकि तुम/ हर वस्तु का नापतोल/ पहले ही तय कर लेते हो।
दिलीप कुमार पाण्डेय की रचनाओं में सामाजिक दर्शन और समाज की विसंगतियों का स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति पाई जाती है। इस संग्रह में उनके जीवन के संघर्ष, मनुष्य के भीतर की टूटी चुप्पियां, समाज की व्यापकता, आड़ी रेखाएं, रिश्तों में रिसाव—सब एक ही देह में धड़कते हुए प्रतीत होते हैं।
पुस्तक : मैं समय हूं कवि : दिलीप कुमार पाण्डेय प्रकाशक : बिंब प्रतिबिंब प्रकाशन फगवाड़ा, पंजाब पृष्ठ : 136 मूल्य : रु. 279.

