‘सब लोग यही बोलते हैं कि कनाडा में मैं खूब मजे कर रहा हूं। खूब पैसा है। इज्जत है। गांव में और रिश्तेदारों के बीच में शोहरत है। ...पर कोई मेरे दिल में झांककर देखे। मैं बिल्कुल अकेला हूं। अपनी जमीन और जड़ों से कटा हुआ...। मैं भारत अपने घर में लौटना चाहता हूं। किंतु मेरे घर-परिवार के लोग मना करते हैं। बोलते हैं यहां क्या करोगे? ...आप सोचिए सर जी, वे सिर्फ यह चाहते हैं कि मैं उनको पैसे भेजता रहूं। दो साल पहले बहन की शादी हुई वह सब मैंने किया। चाचा ने ट्रक खरीदा मुझ से उधार पैसे मांगे मैंने दिए। मैं जानता हूं कि चाचा मेरे पैसे नहीं लौटाएगा। छोटे भाई की आदतें खराब हैं। उसने ट्रैक्टर खरीदा उसके पैसे मैंने दिए।’
आज मुझे उसके देहांत का दुःखद समाचार मिला है। उसके भाई ने उसी के मोबाइल फोन पर संक्षिप्त-सा मैसेज भेजा है–‘रवि नहीं रहा।’ मैंने तत्काल कॉल बैक किया, ‘अरे! कैसे...? दो दिन पहले तो मेरी बात हुई थी उस से।’ हैरानी से मैंने इतना ही कहा। भाई का सपाट-सा जवाब, ‘ब्रेन हैमरेज हुआ था?’ मैं कुछ और कहूं, उसने फोन काट दिया। और कुछ कहने और पूछने को कुछ रह नहीं गया था। एक गहन उदासी छा गई। मैं सपने में भी सोच नहीं सकता था कि इतनी जल्दी वह इस संसार को छोड़कर चला जायेगा। अभी उसकी उम्र ही क्या थी। चालीस-बयालीस साल! एक साल पहले हमारा परिचय हुआ था। व्हाट्सएप पर संदेश आते-जाते रहते थे। वह कनाडा में था तब भी। उसका अचानक यूं चले जाना कई सारे प्रश्न छोड़ गया। उससे पहली बार मिलना और बातें करना कई मानस बिम्बों की रील जैसा लगा। एक उदास युवा चेहरे की मासूमियत और कोमलता के कई चित्र सामने आ-जा रहे थे।
स्मृति की गली में पीछे लौटकर देख रहा हूं। एयर इण्डिया की फ्लाइट में हमारा परिचय हुआ था। हम दोनों कनाडा से ही आ रहे थे। मेरी और उसकी सीट साथ-साथ थी। यह फ्लाइट गिनी-चुनी फ्लाइटों में से एक थी, जो कनाडा से दिल्ली तक सीधे आती थी। नॉनस्टॉप। इतनी बड़ी दूरी तक पंद्रह या सोलह घण्टे की यात्रा बड़ी थकान भरी, उबाऊ और असहज बनाने वाली है। दूसरा रास्ता यह है कि दो या तीन फ्लाइट बदलो। जिसके लिए एक रात होटल में रहो। उसमें समय भी अधिक लगता है।
परिचय हुआ। ‘मेरा नाम रवि है। कनाडा वालों ने मुझे रोवी बना दिया!’ –कहते हुए वह हंसा था। उसके चेहरे पर एक निश्छल दीप्ति भासित हो आई थी। वह बड़ा दिलचस्प आदमी था। ‘आप कनाडा में ही रहते हो?’ मैंने पूछा। ‘जी!’ संक्षिप्त-सा उत्तर। लेकिन गर्मजोशी से भरा हुआ। ‘आप भी?’ उसने पूछा। ‘नहीं भाई! मैं देहरादून में रहता हूं। एक सेमीनार में आया था। वैंकूवर में। पिछले सप्ताह। दो दिन वहां रहा। बाकी दिनों में घूमघाम।’ मैंने बताया। पूछा, ‘आप क्या करते हो यहां? कोई जॉब है या बिजनेस?’ उसने बताया कि वह एक गैरेज में काम करता है। इसी बीच व्योमबाला ट्रॉली लेकर हमारी रो के पास आ गयी। ‘टी, कॉफी, जूस? सॉफ्टड्रिंक, कोक और एनी ड्रिंक?’ मैंने मिक्स्ड जूस लिया। उसने अपनी पसंद का ड्रिंक बनवाया। ‘सर जी आप नहीं लेते?’ उसके ऐसा पूछने पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘अभी शुरू नहीं की है!’ वह भी मुस्कुराया। मुस्कुराते हुए बेहद शालीनता से उसने कहा, ‘तो आज से शुरू कर दीजिए! मेरी ओर से!!’ कहकर संकोच में आ गया। ‘सॉरी सर जी! मैंने ऐसे ही बोलने के लिए बोल दिया। मुझे नहीं बोलना चाहिए था।’ उसने क्षमा मांगी। ‘देट्स ओके! मुझे कोई समस्या नहीं है।’ वह अभी हल्के सुरूर में आने लगा था। उसने लगातार तीन पैग लिए।
ट्रॉली फिर आई। इस बार खाना था। इस बार दूसरी व्योम बाला थी। ‘वेज या नॉनवेज...?’ पूछकर मुस्कुराई। वो तो टिकट बुक कराई थी तभी ऑप्शन दे दिया था, जैन वेज! रवि ने भी मेरी तरह शाकाहार लिया। खाना खाने के बाद उसने सोने का उपक्रम किया। लेकिन व्हिस्की का सुरूर उसके सिर पर चढ़ने लगा। उसने बोला तो बहुत कुछ था। लेकिन मुझे कुछ ही बातें याद आ रही हैं। भारत और कनाडा के जीवन, राजनीति और समाज, आर्थिक और संस्कृति, चिकित्सा आदि-आदि की। मैं सोच रहा था, इसे इन सब चीजों में रुचि है और उसकी जानकारी अपडेट है। आज की नयी जैनरेशन सजग है। अच्छा लगा। मैं कुछ बोलना नहीं, उसे सुनना चाहता था। ‘तुम तो यहीं सैटल हो गये हो, इसलिए यहां की लाइफ़ स्टाइल की प्रशंसा कर रहे हो।’ अचानक उसका स्वर बदला। बोलते-बोलते उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे। उसने बताया कि उसे दो साल तो बहुत अच्छा लगा। नयी जगह, नया समाज, नये लोग और सब अपने-अपने कामों में खोए हुए। शांत प्रकृति का अद्भुत दृश्य सब जगह मिलेगा। यह सब अपनी जगह सही है। लेकिन पहाड़ों का जीवन बहुत कठिन है। बारिश खूब होती है और बर्फ गिरती है रज के। कनाडा का मौसम तरह-तरह का रहता है। आठ साल से मुझे यहां बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। घर, गांव और अपना देश बहुत याद आता है।’ मैं चुपचाप सुनता रहा। वह बोलते-बोलते अपनी सारी कठिनाइयों के जंगल में अकेला था। अब उसके व्यक्तिगत जीवन का संदर्भ खुलने लगा था। ‘सब लोग यही बोलते हैं कि कनाडा में मैं खूब मजे कर रहा हूं। खूब पैसा है। इज्जत है। गांव में और रिश्तेदारों के बीच में शोहरत है। ...पर कोई मेरे दिल में झांककर देखे। मैं बिल्कुल अकेला हूं। अपनी जमीन और जड़ों से कटा हुआ...। मैं भारत अपने घर में लौटना चाहता हूं। किंतु मेरे घर-परिवार के लोग मना करते हैं। बोलते हैं यहां क्या करोगे? ...आप सोचिए सर जी, वे सिर्फ यह चाहते हैं कि मैं उनको पैसे भेजता रहूं। दो साल पहले बहन की शादी हुई वह सब मैंने किया। चाचा ने ट्रक खरीदा मुझ से उधार पैसे मांगे मैंने दिए। मैं जानता हूं कि चाचा मेरे पैसे नहीं लौटाएगा। छोटे भाई की आदतें खराब हैं। उसने ट्रैक्टर खरीदा उसके पैसे मैंने दिए।’ वह सचमुच रोने लगा था और अपनी रौ में बोले जा रहा था। मैंने उसको बह जाने दिया। शराब पीने वाला जब नशे में होता है तो सच-सच बोलने लगता है। मैंने अपने दाहिने हाथ में उसका बायां हाथ थाम लिया था। वह बहुत कोमल और पवित्र इंसान का हाथ था। उसने अपनी बात आगे बढ़ाई, ‘मैं इन लोगों की वजह से साल में दो बार आता हूं। पैसा उनको दे देता हूं। तीन-चार दिन बाद कहने लगते हैं; कितनी छुट्टियां लेकर आया है। काम का हर्ज होगा तो पैसे भी कटेंगे। उनको सिर्फ पैसे से मतलब है। मेरी शादी वे लोग नहीं कराना चाहते थे। बस चाहते थे कि मैं कनाडा में ऐसे ही पड़ा रहूं और उनको पैसा देता रहूं। पैसे की मशीन बनाकर रख दिया है मुझे। एक बार आने-जाने में भी तो बहुत पैसा खर्च हो जाता है। ऑफ सीजन में भी किराया एक लाख से घट नहीं। लंदन होकर आओ तो थोड़ा समय बच जाता है। पिता अच्छे थे। लेकिन वे अब रहे नहीं। वे साहू आदमी थे। सब समझते थे। रिश्तेदारों ने इस काम में मेरी मदद की। दो साल पहले मेरी शादी जालंधर से हुई है। एक साल का बच्चा है मेरा। पत्नी भी यहां कनाडा आना चाहती है। उसे टालता रहता हूं। इस बारी सब कुछ बताऊंगा यहां की लाइफ के बारे में।’ उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे। बहुत भावुकता इंसान है। मुझे लगा कि उसके दिल में कोई मछली तड़प रही है। उसके भीतर का दर्द मुझे अपनी कहानी सुनाकर कम होने लगा था। शायद लंबे समय से उसकी किसी भारतीय से हिंदी या पंजाबी में बात नहीं हुई है। इसलिए यह एक साथ बहुत कुछ शेयर करना चाहता है। वह अब शांत हो गया था। मैंने भी कोई और बात नहीं की। वह एक रोते-रोते सो गए शिशु की तरह लग रहा था। निष्पाप और मासूम। अपने अकेलेपन से जूझता।
नई दिल्ली इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट आने को था। परिचारिका एक छोटा-सा फॉर्म बांट रही थी, जो सब यात्रियों को भरकर वापस देना था। उसने मुझे अपना पासपोर्ट और फॉर्म यह निवेदन करते हुए दिया ‘सर जी! प्लीज इस फॉर्म को आप भर दीजिए। मैं इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं। सिर्फ दस्तखत करना जानता हूं।’ उसे यह कहते हुए झिझक लग रही थी और झेंप महसूस कर रहा था। उसके गले में सोने की मोटी चेन पड़ी हुई थी और वह दोनों हाथों की उंगलियों में बड़ी-बड़ी अंगुठियां पहने हुए था। मेरा ध्यान इस ओर अब गया। उसने अनुभव कर लिया कि मेरी निगाह कहां है। वह बोला, ‘सर जी इन सब चीजों को बेचकर रुपया ले लेंगे घरवाले।’ मेरे मन में आया कि पूछ लूं कोई और तरीका नहीं है पैसा भेजने का? वह मेरे चेहरे की ओर देखने लगा। ‘जैसे बैंक एकाउंट में ऑनलाइन ट्रांसफर?’ मैंने कहा। ‘सर जी, ऑनलाइन तो इधर कुछ सालों में शुरू हुआ है। हम लोग हवाला से पैसा भेज देते थे। बस एजेंट को कुछ पर्सेंट कमीशन देना होता है। मैंने सुना तो था, लेकिन कभी ऐसा अवसर नहीं आया। उसने बताया, ‘हम कनाडा में एक एजेंट को जानते थे। वह दिल्ली या जालंधर में अपने साथी के लिए रकम भेजने का तरीका यह अपनाता था कि हमारे घर के किसी सदस्य भाई या मां को बोलता कि पचास या सौ के एक करेंसी नोट का नम्बर बताओ। और उधर उस नम्बर के करेंसी नोट को इधर के आदमी को देना होता था। उनके आपसी विश्वास की बात थी। यहां का एजेंट हमारे घर के आदमी के उस नम्बर के नोट को अपने पास रख लेता था। उसका कमीशन अलग था।’ जाने क्या-क्या खेल हैं इस माया के! उसके साथ बात करने की स्मृतियां अभी धुंधली नहीं हुईं। ‘सर जी, कहां गुम गए आप अभी तो कुछ बातें और बतानी थीं। वह कुछ और भी कहना चाहता था। लेकिन उसने देख लिया कि अपनी इतनी लम्बी कहानी में मुझे अब कोई रुचि नहीं है।
आज मैं सोच रहा हूं कि इस नवयुवक का जीवन सेल्मन मछली जैसा था। सेल्मन मछली की विशेषता यह है कि वह हजारों किलोमीटर दूर भी हो, तो भी अपने अंतिम दिनों में वहीं लौटकर आ जाती है, जहां उसने जन्म लिया था। प्रजनन करती है और कुछ समय बाद मर जाती है।
मेरी आंखों में वैंकूवर के अनेक मनोरम परिदृश्य उभर रहे हैं। सड़कें, सड़कों पर बिछे गलीचों जैसी पत्तियां, चेरी ब्लासम के खिले हुए फूल, बर्फ़ से ढके खूबसूरत पहाड़। जीवंत रंगों और रोमांच से भरपूर जीवन। लेकिन इन सबके बीच छटपटाती सेलम मछलियां।

