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सब्जबाग

लघुकथा

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चाय की दुकान पर चल रहे टी.वी. पर नेता जी अपनी लच्छेदार संवाद अदायगी का जौहर दिखा रहे थे। ‘भाइयो-बहनो हम प्रगति के पथ पर रहे हैं दौड़। दी है सारी जंजीरें, तोड़। देखो विकास की होड़। बैंक खाते अड़तीस करोड, गैस सिलेंडर बारह करोड़। शौचालय ग्यारा करोड़ आंकड़ों का जोड़-तोड़। लाखों-लाख करोड़। युवा शक्ति महान संस्कृति... न्यू इंडिया... डिजिटल इंडिया... सुपर पावर... स्वच्छ भारत... स्वस्थ भारत...।’

चाय की दुकान के अंदर-बाहर बैचों पर बैठे लोग जोर-जोर से तालियां बजाने लगे। एक बैंच के कोने पर बैठे हरिलाल ने देखा सड़क के दूसरी तरफ फुटपाथ पर एक मजमेबाज लोगों को दिन-दहाड़े सतरंगी सपने दिखा रहा था। लोग उसे घेरकर खड़े थे। मेहरबान, कद्रदान आप में हैं शक्ति अपार पर असफल होते हैं बार-बार। करते हैं मेहनत दिन-रात पर बनती नहीं है बात। चारों तरफ है धोखा और छल। आपको चाहिए अपनी समस्याओं का हल! बेरोजगारी, बीमारी, प्रेमिका या पति की बेरुखी मुकदमा या कर्ज। है सबका इलाज मेरे पास कुछ भी हो मर्ज।’ लोग तालियां बजाने लगे। उधर नेता लोगों को मृग-मरीचिकाओं में भटका रहे थे। ‘देखकर हमारी तरक्की पूरी दुनिया है हैरान। अमेरिका, इंग्लैंड या होे जापान। अब नहीं हम भूखे गरीब अभागे। देश हमारा निकल गया है आगे...।’

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उधर कड़कती धूप में मजमेबाज लोगों के सामने अनगिनत इन्द्रधनुष टांक रहा था। ‘मेरे पास है एक झुनझुना, जिसे लाखों ने अपनाया लाखों ने है चुना। झुनझुना है करिश्माई जो दूर करें सब कठिनाई। आपको चाहिए नौकरी- छोकरी। मुकदमा है जीतना! कर्ज है चुकाना या दुश्मन को है सबक सीखाना तो घर ले जाकर बजाइये यह झुनझुना। सब दिक्कतें होंगी आपकी दूर। अब चिन्ता छोड़िये हुजूर। कीमत पचास रुपये पचास-रुपये-पचास रुपये का एक नोट एक नोट एक नोट....।’ नेता जी अपने रंगबिरंगे आकर्षक शब्दों के वाग्जाल फेंक रहे थे। देश-विदेश में हो रही है हमारी नीतियों की अच्छाइयां देश छू रहा है ऊंचाइयां, अगर दूर करनी है अपनी बदहाली। लानी है खुशहाली। खुशियों की नहीं, रहेगी कोई सीमा। दे रहे हैं पाच लाख का बीमारी बीमा। सुनहरा है कल सुन्दर है आज। नहीं मरेगा कोई बिना इलाज। नहीं रहेगा कोई भूखा, बिना छत और बेरोजगार। दो अपना कीमती वोट। अपना एक वोट, अपना एक वोट, अपना एक वोट।’

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तालियां दोनों तरफ बज रही थी। हरिलाल की आंखें गीली थीं। जिन्हें देख उसके पास बैठे उसके एक जानकार ने पूछा, ‘क्या हुआ? तुम तो अपने नौ साल के बेटे का इलाज करवाने दिल्ली आये थे? कैसा है वह?’

‘कहां-कहां नहीं भटका बच्चे को लेकर...? पिछले आठ महीने से दिल्ली के अस्पतालों में धक्के खा रहा हूं। सरकारी अस्पताल होने के बावजूद उसके हार्ट के छेद का ऑपरेशन का एक लाख जमा करवाने को कह रहे थे। कहां से लाता? स्वास्थ्य मंत्री, प्रधानमंत्री कहां-कहां दरख्वास्तें नहीं दी मैंने? कल जवाब आया ‘फिलहाल सरकार के पास फंड्स की कमी है। दो-तीन साल बाद विचार किया जा सकता है।’ लेकिन मेरा बच्चा इलाज से ठीक हो सकने वाली बीमारी के बावजूद बिना इलाज के तीन दिन पहले ही गुजर गया है।’

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