सड़़क, तुम अब आई हो गांव,
जब उजड़ चुके हैं खेत,
Advertisement
बिछड़ चुके हैं लोग,
Advertisement
पिघल चुकी है बर्फ,
उपज चुके हैं रोग।
सड़़क, तुम अब आई हो गांव,
जब बंद हो चुकी हैं बारिशें,
सूख चुका है सावन,
बिक चुकी हैं गाय,
टूट चुका है आंगन।
सड़क, तुम अब आई हो गांव,
जब झड़ चुके हैं पत्ते,
बिछ चुकी है घास,
जल चुके हैं जंगल,
बुझ चुकी है आस।
सड़क, तुम अब आई हो गांव,
जब बुरांश गल चुके,
जब हिलांश ढल चुके,
प्यासी हैं नदियां और
तिथाण जल चुके हैं।
सड़क, तुम अब आई हो गांव,
जब स्नेह जा चुका,
सम्मान जा चुका है,
लिहाज़ और शरम का
मकान जा चुका है।
सड़क, तुम अब आई हो गांव,
जब सब शहर हो चुका है।
Advertisement
×

