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संस्कार

लघुकथा

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‘तुझे शादी करने को एकमात्र वही लड़का मिला? न मां-बाप का पता, न घर-बार का... न जाने किसका ‘पाप’ होगा, जो उसे छोड़ गई अनाथालय में!’ एक ही सांस में मां बहुत कुछ बोल गई अपनी बेटी से।

‘...लेकिन मां क्या जरूरी है कि वह किसी का पाप ही हो, कोई दूसरी मजबूरी भी तो हो सकती है उसकी मां की!’ बेटी बोली।

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‘...दूसरी मजबूरी क्या? कोई भी मां अपनी संतान को और वह भी बेटे को ऐसे ही अनाथाश्रम में छोड़ती है क्या?

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‘...लेकिन मां अनाथालय में पल-बढ़ कर भी आज वह ‘स्टेटस’ वाला है... पॉश कॉलोनी में उसके पास महंगा बंगला है, फोर व्हीलर है, नौकर-चाकर हैं और मां सबसे बड़ी बात वह मेरे साथ जिस पद पर काम करता है न, उसके हाथ के नीचे 20 से 25 लोग काम करते हैं।’ बेटी ने मां को समझाना चाहा।

‘...लेकिन संस्कार किसने देखे हैं उसके? कैसे चाल-चलन हैं, तुम्हें क्या मालूम? ...तुम केवल उसकी ऊपरी चकाचौंध देख रही हो! मां ने बेटी की बात काट कर कहा।

‘मां क्या अनाथालय में संस्कार नहीं मिलते? तुम संस्कार की बात कर रही हो... वह अपने से बड़ों को बहुत आदर-सम्मान देता है, गुस्सा उससे कोसों दूर है... और तो और वह अपने साथ काम कर रहे छोटे से छोटे कर्मचारियों तक से प्यार व सम्मान से बात करता है... एक बात कहूं मां? ऐसे गुण, ऐसे संस्कार तो आपके ‘खानदानी कुलदीपक’ में भी नजर नहीं आते हैं।’ बेटी एक ही सांस में बोल गई।

मां निरुत्तर थी।

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