विनोद शाही की नव प्रकाशित पुस्तक ‘नव-इतिहास दर्शन, साहित्य और इतिहास’ एक ऐसी मीमांसा प्रस्तुत करती है, जो न केवल इतिहास को समझने, बल्कि उसे बदलने की दृष्टि प्रदान करती है। आज इतिहास का अर्थ ही नहीं बदल रहा, बल्कि उसे समझने की नई-नई दृष्टियां भी सामने आ रही हैं कि साहित्य में इतिहास कैसे उतरता है और उसे कैसे ग्रहण किया जाए? इतिहास क्या है? ‘साहित्य में जो इतिहास अभिव्यक्ति पाता है, वह इतिहास का जैविक रूप होता है।’
पुस्तक के ज़रिए एक बड़ा सवाल उठाया गया है कि इतिहास की मार्फत साहित्य और साहित्य की मार्फत इतिहास की आत्मा में कैसे प्रवेश किया जाए? यह एक उल्टी यात्रा की तरह है, कि इनके बीच किस तरह के अन्तर-संबंध संभव हैं। हिंदी में मौलिक चिंतन का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इससे पूर्व हिंदी में मैनेजर पांडेय और शिव कुमार मिश्र जैसे मार्क्सवादी चिंतकों ने समाजशास्त्र और इतिहास दर्शन पर मार्क्सवादी नज़रिए से पुस्तकें अवश्य लिखी हैं, लेकिन विनोद शाही का इतिहास चिंतन इन दोनों आलोचकों से कहीं आगे नव-इतिहास दर्शन के नए सूत्र लेकर आया है।
इस किताब के तीन अध्याय हैं। इतिहास के सैद्धांतिक पक्षों पर विचार करते हुए लेखक सीधे-सीधे उसके साहित्यिक, जैविक, भाषिक, सभ्यता-मूलक सांस्कृतिक दार्शनिक पक्षों को समेटते हुए आलोचना के भविष्य की नई संभावनाएं तलाशते दिखाई देते हैं। एक प्रबुद्ध विचारक दार्शनिक की तरह उनका अध्ययन वैश्विक विमर्शों में छलांग लगाता हुआ अपनी ज़मीन की आलोचना को बचाने का भरसक प्रयास करता है।
‘सत्य से भटकता चिंतन का पोलेमिकस’ विषय पर विचार करते हुए लेखक वाल्टर बेंजामिन, लूकाच, टेरी ईगलटन, लेवी स्ट्रॉस और तमाम उत्तर संरचनावादी चिंतकों के अध्ययनों और उनके अंतर्विरोधों पर विचार करते हैं कि कैसे इनकी पोलेमिकस को समझे बिना भारतीय चिंतन उत्तर-औपनिवेशिकता का शिकार होता गया।
आज जब आलोचना के तमाम बुनियादी औजार और प्रतिमान सवालों के घेरे में हैं, तो यह गहन आत्मावलोकन और आत्मालोचना का समय है कि कृतियों के भीतर और बाहरी संसार के बीच साहित्य के इतिहास पक्ष को कैसे बदला जाए, ताकि आलोचना का भविष्य भी बदले। इस दृष्टि से यह किताब पाठकीय इतिहास दृष्टि में एक नए बदलाव की संभावनाओं की ज़रखेज़ ज़मीन तलाशती नजर आती है।
पुस्तक : नव इतिहास दर्शन लेखक : विनोद शाही प्रकाशक : आधार प्रकाशन, पंचकूला पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 250.

