याद रहेंगे रेजांग-ला के रणबांकुरे

पुस्तक समीक्षा

याद रहेंगे रेजांग-ला के रणबांकुरे

राजकिशन नैन

नरेश चौहान राष्ट्रपूत द्वारा प्रणीत ‘रेजांगला की शौर्य गाथा’ हमें भारतीय इतिहास के उन सुभट वीरों और माटी की खातिर प्राण वारने वाले रणबांकुरों की याद दिलाती है जिन्होंने 18 नवंबर, 1962 को लद्दाख की 19 हजार फीट ऊंची सर्द बियाबान पहाड़ियों पर अपने खून से शूरता की एक कालजयी कहानी लिखी थी। चूंकि लद्दाख की सरहद पर आज भी उसी शत्रु चीन से हमारा सामना है, इसलिए देश को रेजांग-ला की उस अपराजय भावना को जीवंत बनाये रखने की सदा जरूरत है।

आज से 60 साल पहले चुशुल सेक्टर में पैंगोंग झील के दक्षिण में स्थित रेजांग दर्रे पर 13 कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी तैनात थी। कंपनी के जवानों के पास दूसरे विश्व युद्ध के समय की 303 बोर की राइफलें थीं। हर जवान के पास केवल 300-400 राऊंड गोलियां थीं और कुल एक हजार हथगोले। 18 नवंबर की रात दो बजे चीनी सेना ने एकाएक हमला बोल दिया। चीनी सैनिकों की संख्या 5000 से ज्यादा थी। चार्ली कंपनी के कमांडर मेजर शैतान सिंह के साथ 3 जूनियर कमीशंड अधिकारी और 124 जवान थे। इसके बावजूद एक भी भारतीय जवान अपनी पोजीशन से एक इंच भी पीछे नहीं हटा।

मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी ने जान हथेली पर रखकर जबरदस्त लड़ाई लड़ी। सामने की ढलान चीनियों की लाशों और चीखते-चिल्लाते घायलों से पट गई। हमारे मुट्ठी भर सैनिकों ने चीन के 1300 से ज्यादा सैनिकों को मार गिराया। पर चीनियों की ज्यादा फौज और उत्कट गोले-हथियारों के कारण अंततः हमारा मोर्चा टूट गया। अंतिम सांस और अंतिम गोली तक लड़े हमारे 114 वीरों ने रेजांग-ला युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी।

मेजर शैतान सिंह ने अंतिम विदाई लेने से पहले अपने दो-चार घायल सैनिकों को जबरदस्ती वापस छावनी भेजा ताकि कोई तो शहादत की कहानियां बताने हेतु जिंदा रहे। उनमें से ब्रिगेडियर आरवी जटार (सेवानिवृत्त) आज भी सलामत हैं। युद्ध में सर्वाधिक 60 बलिदानी हरियाणवी थे। इनमें भी 30 जवान अकेले रेवाड़ी और 15 जवान महेंद्रगढ़ जिले के थे। बाकी रोहतक, भिवानी व गुड़गांव जिलों से थे। पंजाब से एक, उत्तर प्रदेश से 24 एवं राजस्थान के 25 जवान भी रेजांग-ला युद्ध में काम आए थे।

युद्धोपरांत कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह भाटी (गांव बानासर, फलौदी-जोधपुर) को शहादत के बाद देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से विभूषित किया गया तथा लांस नायक सिंघराम यादव (गांव धवाना-रेवाड़ी), नायक गुलाब सिंह यादव (गांव मनेठी-रेवाड़ी), सूबेदार सुरजा राम यादव (गांव भैरमपुर-रेवाड़ी), नायक हुक्मचंद यादव (गांव नखड़ौला-गुड़गांव), नर्सिंग सहायक धर्मपाल सिंह दहिया (गांव निरधान-सोनीपत), आनरेरी कप्तान रामचंद्र यादव (गांव मंदोला-रेवाड़ी) और आॅनरेरी कप्तान रामकुमार यादव (गांव गोठड़ा-रेवाड़ी) को ‘वीरचक्र’ से अलंकृत किया गया। क्यू.एच. मेजर हरफूल सिंह, आनरेरी कप्तान फूल सिंह, हवलदार जयनारायण, हवलदार निहाल सिंह (चारों रेवाड़ी) और कर्नल एस.एस. ढींगरा को ‘सेना मेडल’ दिया गया। युद्धोपरांत बर्फीले तूफान ने युद्धभूमि को अपनी चपेट में ले लिया था। चुशूल गांव से 12 कि.मी. दूर 114 वीरों की याद में एक युद्ध स्मारक बनाया गया।

पुस्तक : रेजांगला शौर्य गाथा लेखक : नरेश चौहान राष्ट्रपूत प्रकाशक : कौशिक पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली पृष्ठ : 119 मूल्य : रु. 200.

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

योगमय संयोग भगाए सब रोग

योगमय संयोग भगाए सब रोग

जीवन के लिए साझे भविष्य का सपना

जीवन के लिए साझे भविष्य का सपना

यमुनानगर तीन दर्जन श्मशान घाट, गैस संचालित मात्र एक

यमुनानगर तीन दर्जन श्मशान घाट, गैस संचालित मात्र एक

शहर

View All