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दोहों में समय के सवालों पर चिंतन

पुस्तक समीक्षा

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दोहा साहित्य की वह विधा है जिसके जरिए संदेश अपेक्षाकृत आसानी से पहुंचाया जा सकता है। लेकिन संदेश पहुंचाना जितना सामान्य लगता है, उतना ही कठिन है दोहों की रचना, शब्दों का चयन और श्रमसाध्य व्याकरण। इसी ‘सामान्य श्रेष्ठता’ की लौ में बहने की कोशिश की है कवि सुरेश कुमार ‘कल्याण’ ने अपनी दोहा सतसई ‘मैं भी उतरा पार’ के जरिए। कुल दस खंडों वाली इस किताब में 721 दोहे हैं। हर भाग में उसकी प्रकृति के अनुरूप संदेश है, चेतावनी है और विनती है।

पुस्तक के ‘प्रकृति चिंतन’ खंड में कवि ने जीवनदायिनी नदियों, वृक्षों की महत्ता और उनके अत्यधिक दोहन के दुष्परिणामों पर आगाह किया है और संदेश दिया है। एक दोहा देखिए :-‘काठ पात फल फूल रस, खुश हों छांह बिखेर।/ लेते ना कुछ मूल्य तरु, देते सबको ढेर।’

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अब दोहन का दुष्परिणाम देखिए :-

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‘पीने को पानी नहीं, नहीं श्वास को वायु।/ करनी का फल मिल रहा, घटती जाती आयु।’

इसके अगले खंड ‘बारहमासा’ में सभी ऋतुओं का खूबसूरत वर्णन किया गया है। साथ ही, मौसमी चक्र और इसके आध्यात्मिक पहलू पर भी ‘कल्याण’ ने दोहे लिखे हैं। किस माह में क्या प्राकृतिक चीजें होती हैं, उस पर भी कवि ने कलम चलाई है।

पुस्तक के ‘नशामुक्ति’ खंड में कवि ने भौतिक और आभासी नशे के प्रति चेताया है। इसी तरह ‘देशभक्ति’ खंड में मातृभूमि के हर पहलू को नमन किया गया है। तिरंगे की शान से लेकर हालिया संघर्ष में सैनिकों की वीरता को दोहों के माध्यम से सैल्यूट किया गया है।

‘विविधा’ खंड में कवि ने विभेद की विद्रूपता और विविधता की खूबसूरती का ताना-बाना बुना है। एक दोहा है :-

‘हिंदी तेरी डाल पर रंग-बिरंगे फूल,/ भोजपुरी हरियाणवी, रही मैथिली झूल।’

संदेश देने वाले ये दोहे सरल, सहज अंदाज में लिखे गए हैं।

पुस्तक : मैं भी उतरा पार (दोहा सतसई), लेखक : सुरेश कुमार 'कल्याण', प्रकाशक : मंडा पब्लिशर्स, दिल्ली पृष्ठ : 130 मूल्य : रु. 249.

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