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असली जीत

कविताएं

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जब कोई गाली देता है,

बदले में चुप रह जाता हूं,

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तब कायर मुझको लोग समझने लगते हैं।

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पर मुझे पता है, गाली मैं भी दे दूंगा,

तो जीत सामने वाले की हो जायेगी।

मैं भी उसके जैसा ही,

कीचड़ में लथपथ हो जाऊंगा,

इसलिये कभी जब कोई गुस्सा होता है,

मैं बदले में देकर मीठी मुस्कान,

आग में पानी डाला करता हूं।

जो अपने गुस्से की ज्वाला में,

मुझे जलाने वाला था,

वह आग बुझाते ही मेरे

शर्मिंदा होने लगता है।

धुलने लगता जब मैल,

साफ-सुथरा वह होने लगता है,

तब मुझको अपनी जीत दिखाई पड़ती है।

पुल बनने की ख्वाहिश

मैं अक्सर पुल बनने की कोशिश करता हूं,

कुछ लोग बहुत आगे हो जाते,

कुछ पीछे रह जाते हैं,

तो मैं दोनों के बीच, राह पर चलता हूं।

यह सच है आगे-पीछे जो भी हैं,

समूह में अपने-अपने चलते हैं,

मैं दोनों को जोड़े रखने के चक्कर में,

निपट अकेला ही अक्सर रह जाता हूं।

पर मुझे पता है टूट गया संबंध अगर,

तो दुनिया यह दो हिस्सों में बंट जायेगी,

दोनों ही एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन जायेंगे।

मिलकर दोनों कर सकते हैं अद्‌भुत विकास,

पर अलग-अलग हो लड़-भिड़कर मर जायेंगे,

इसलिये क्षीण ही सही मगर

संबंध बीच दोनों के कायम रखता हूं।

मैं नहीं तोड़ने में रखता विश्वास,

जोड़ना मुझको अच्छा लगता है।

किस्मत का रहस्य

जिन दिनों बहुत मैं चौकन्ना-सा रहता था,

लोगों को ठग लूं भले मगर

कोई न मुझे ठग सकता था।

भोले-भाले लोगों को लेकिन

देख मुझे महसूस हुआ,

चौकन्ना रहकर भी मैं गहरी,

नींद नहीं सो पाता था।

वे मगर ठगाये जाने का भय होने पर भी,

घोड़े बेच के सोते थे।

तब से मैंने चौकन्ना रहना छोड़ दिया,

खुद भले ठगा जाऊं लेकिन,

लोगों को ठगने का विचार तक

मन में लाना छोड़ दिया।

यह समझ गया जैसा हम रखते मनोभाव,

मन स्वयं हमारा हमको उसका,

दे देता है उचित दण्ड या पुरस्कार।

बाहर का सारा न्याय शास्त्र तो

छाया है या माया है,

जो बैठा न्यायाधीश हमारे भीतर है,

वह न्याय हमारा करता है।

किस्मत जिसको हम कहते हैं,

वह इसी न्याय का प्रतिफल है।

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