‘लिख... राग रंग अनुराग...’ श्रीमती कमल कपूर की सद्यः प्रकाशित दोहा सतसई है। संग्रह के दोहों को छह खण्डों में क्रमशः प्रकृति के राग, स्वर्ग तुल्य कश्मीर, रंग रिश्तों के, शृंगार-अनुराग के रंग, मेरा स्वर्णिम भारत और विविध रूप अरु रंग में विभक्त किया गया है और फिर आगे कई उपखंडों में बांटा गया है। संग्रह का पहला खंड प्रकृति को समर्पित है, इसलिए इन दोहों में भोर की लालिमा है तो दोपहर का घाम और सुरमई शाम भी है। फूल और कलियां हैं, तो नदियां और सागर भी हैं।
संग्रह के दोहे प्रकृति के विभिन्न रूपों से तो रूबरू करवाते ही हैं, घर बैठे कश्मीर की सैर भी करवाते हैं। कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य, वहां का जन-जीवन, इतिहास और महान विभूतियों का वर्णन संग्रह के दोहों में है, वहीं दोहाकार ने घाटी की पीड़ा को भी प्रस्तुत किया है।
कवयित्री ने रिश्ते-नाते, मां का गांव, नीम की छांव, नर-नारायण, नारी और नारायणी के साथ-साथ पर्व और त्योहारों को भी अपने दोहों का कथ्य बनाया है। संग्रह के अनेक दोहे उनके देखे-भोगे सच को अभिव्यक्त करते हैं।
संग्रह के दोहों में दीप-वर्तिका, शमा-शलभ, राधा-श्याम, बसंत के रंग-फागुन और उमंग को भी स्थान मिला है। दोहाकार ने सौंदर्य और प्रेम के सुंदर दोहे रचे हैं—
निरख नदी के नूर को, भाव उठे हैं जाग।/ कमल-कली सी कामिनी, लिखे राग अनुराग।
रचनाकार का लंबा लेखन अनुभव होने के कारण भाषा पर पकड़ और कथ्य में विविधता है। अधिकांश दोहे पाठक पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। संग्रह के कुछ दोहों में छंद-दोष रह गए हैं। कहीं मात्राएं बढ़ी हुई हैं, कहीं घटी हुई हैं, और कुछ में लय भंग हैं।
पुस्तक : लिख... राग रंग अनुराग... कवयित्री : कमल कपूर प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 172 मूल्य : रु. 480.

