चांद तक पहुंचे मगर इंसान तक नहीं
कहा जाता है कि दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है। आदमी चांद पर पहुंच गया है, मंगल पर जाने की तैयारी कर रहा है और ऐसी मशीनें बना ली हैं जो इंसानों की तरह बातें कर सकती हैं। लेकिन इस...
कहा जाता है कि दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है। आदमी चांद पर पहुंच गया है, मंगल पर जाने की तैयारी कर रहा है और ऐसी मशीनें बना ली हैं जो इंसानों की तरह बातें कर सकती हैं। लेकिन इस सारी प्रगति के बीच एक पुरानी आदत अब भी बची हुई है—लड़ना।
सुबह अखबार खोलिए तो कहीं युद्ध की खबर है, दोपहर तक किसी दूसरे देश में तनाव और शाम होते-होते किसी नए संघर्ष की चर्चा। लगता है जैसे दुनिया का नक्शा नहीं, किसी अखाड़े का पोस्टर सामने रखा हो।
आम इन युद्धों से कोई सीधा संबंध नहीं है। न ही वे विदेश नीति बनाते हैं और न ही किसी शांति वार्ता में शामिल होते हैं। फिर भी हर लड़ाई धीरे-धीरे उसकी रसोई तक पहुंच जाती है। कहीं मिसाइलें चलती हैं और यहां बाजार का मिजाज बदल जाता है।
एक दिन आम ने किराने की दुकान पर पूछा, “दाम फिर बढ़ गए क्या?”
दुकानदार बोला, “दुनिया में तनाव बढ़ गया है।”
आम ने कहा, “तनाव तो हजारों किलोमीटर दूर है।”
वह मुस्कराकर बोला, “साहब, अब तनाव हवाई जहाज से आता है, इसलिए बहुत जल्दी पहुंच जाता है।”
उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच दुनिया छोटी हो गई है। युद्ध कहीं होता है और चिंता कहीं और पहुंच जाती है। अंतरिक्ष में पानी खोजा जा रहा है और धरती पर बारूद।
संयुक्त राष्ट्र की स्थिति भी अब उस मोहल्ला समिति जैसी लगती है जो हर झगड़े के बाद बैठक तो बुलाती है, लेकिन पड़ोसियों को समझा नहीं पाती। चिंता व्यक्त होती है, शांति की अपील की जाती है और अगले दिन फिर कहीं धुआं उठने लगता है।
दुनिया के बड़े देश भी कम दिलचस्प नहीं हैं। वे शांति सम्मेलनों में कबूतर उड़ाते हैं और हथियारों के बाजार में नए सौदे करते हैं। ऐसा लगता है जैसे डॉक्टर पहले बीमारी बांट रहा हो और फिर दवा बेचने की तैयारी कर रहा हो।
एक परिचित ने कहा, “युद्ध कभी-कभी जरूरी भी होते हैं।”
पूछा, “किसके लिए?”
वह बोला, “राष्ट्रहित में।”
सोचा कि राष्ट्रहित और रसोई हित के बीच शायद बहुत लंबी दूरी है। युद्ध कहीं भी हो, उसका असर अंततः उसी आदमी पर पड़ता है जो महीने के अंत में अपना बजट मिलाने की कोशिश कर रहा होता है।
डर है कि कहीं इतिहास की किताबों में यह न लिखा जाए कि मनुष्य वह प्राणी था जो चांद तक पहुंच गया, लेकिन पृथ्वी पर शांति तक नहीं पहुंच सका।
और तब शायद कोई बच्चा पूछे—“सर, पृथ्वी वाले इतने बुद्धिमान थे, फिर लड़ते क्यों थे?”
शिक्षक कुछ देर चुप रहे और बोले—“बेटा, वे चांद तक तो पहुंच गए थे, लेकिन इंसान तक नहीं पहुंच पाए थे।”
