‘प्रेम ना हाट बिकाय’ कहानी संग्रह की कहानियों का सारतत्त्व कमोबेश प्रेम के सुकोमल अहसास की गरिमा, उसके रिश्तों में संरक्षित व पुष्पित-पल्लवित होने का भाव है। संग्रह की पंद्रह कहानियां कहीं-न-कहीं हमारे जीवन के आसपास पनपी, फली-फूली और उनमें भटकन की दास्तां बयां करती हैं। पुस्तक की शुरुआत में डॉ. राजेंद्र कनोजिया ने ‘मेरा रचना संसार : मेरा संयुक्त परिवार’ में जीवन की यात्रा में अपनों के आत्मीय अहसासों व जीवन की तल्ख सच्चाइयों का जिस ईमानदारी व साफगोई से वर्णन किया है, वह आंखें नम करता है।
निस्संदेह, समीक्ष्य कृति प्रेम की शुचिता को सर्वोपरि मानकर रची गई कहानियों का संग्रह है। शीर्षक कहानी ‘प्रेम ना हाट बिकाये’, एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जो पति की व्यस्तता के चलते उससे दूर होती है। फिर प्रेम की भटकन-फिसलन में अपने से छोटे ऐसे युवक के मोहपाश में बंधती है, जो कभी परिवार में एक किशोर के रूप में शामिल हुआ था। फिर भ्रमित होकर घर छोड़ देती है। एक दिन के घटनाक्रम में वह पारिवारिक साये को छोड़कर स्वच्छंद होना चाहती है। लेकिन इससे उपजा अपराधबोध कचोटता है। शाम होते-होते उसे लक्ष्मण रेखा लांघने का अहसास होता है। कहानी का समापन क्षमा-प्रार्थना के साथ होता है।
संग्रह की पहली कहानी ‘कटी पतंग’ एक अधूरे प्रेम की बानगी दर्शाती है, जिसमें रूप-लावण्य की धनी युवती एक पहाड़ी नदी की तरह स्वच्छंद बहते हुए जीवन सुख तलाशती है। लेकिन कालांतर में उस चमक-दमक की लौ में झुलस जाती है। कहानी दर्शाती है कि प्रेम में समर्पण-त्याग एक सुरक्षाकवच भी देता है।
डॉ. कनोजिया के संग्रह की कहानी ‘तफ्तीश’ गहरे तक दिल को छूती है। यह एक ऐसे शख्स की कहानी है, जो बरसों बाद अपने ही घर में, किसी तफ्तीश के लिए आता तो है लेकिन वहां सिर्फ़ यादों का एक जला हुआ कमरा है। कुछ यादें हैं, मां की, दोस्त की, बाबू जी की और उसकी भी। कहानी उसे अपने ही बीते कल से मिलाती है। इसी तरह ‘अनाम रिश्ते’ एक कलमकार की कहानी है। एक अनाम प्रेम की दास्तान है, जो कभी हुआ ही नहीं। ‘चक्करघिन्नी’ भी ऐसे ही एक लड़की की कहानी है, जो बहुत गुणी होकर भी सुंदरता में थोड़ा मात खाती है। फिर कहीं दूर छूटे अपने प्रेमी की तलाश में रहती है। सभी कहानियां भारतीय परिवेश में प्रेम के सतरंगी अहसासों, विसंगतियों, विद्रूपताओं के साथ ही सुखद अहसासों को भी बयां करती हैं।
पुस्तक : प्रेम ना हाट बिकाय कवि : डॉ. राजेन्द्र कुमार कनोजिया प्रकाशक : प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता पृष्ठ : 144 मूल्य : रु. 250.

