बंद दरवाजे चिंतनशील कवि जयपाल का एक मार्मिक काव्य-संग्रह है, जिसके द्वितीय चरण में ‘दरवाजों के बाहर’ नामक शीर्षक में भी कुछ कविताएं अंकित हैं। कवि कुंठित, दमित और आक्रोशित पीड़ा से रचे शब्दों को बड़ी ईमानदारी से प्रस्तुत करता है। दलित समाज के शोषण, अत्याचार, मानसिक पीड़ा, धर्म-ग्रंथों के संदर्भ में नीचता, भेदभाव, अमानवीयता, संताप, संघर्ष और प्रतिशोध का मिश्रण हृदयस्पर्शी है।
प्रत्येक कविता लघु होकर भी पूर्ण रूप से प्रहार करती दिखाई देती है। हमारे समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े लोग कैसे जीवन जीते हैं, कैसी उतरन पहनते हैं, किस प्रकार के जूठे खाने पर निर्भर रहते हैं, और किस प्रकार के मानसिक द्वंद्व से गुजरते हैं, उनकी इस व्यथा को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाया गया है।
इन कविताओं में एक क्रूर यथार्थ, मनुवादी परंपरा के विरोध का आह्वान, जातिभेद, मनभेद, मतभेद, सदियों पुरानी बेड़ियों वाली जकड़न और एक भीषण दर्द को पढ़ते हुए पाठक द्रवित हो उठता है। कवि ने पूरी चेतना से कड़वे और तीखे शब्दों से इस छुआछूत को समाज से पृथक करने की बुलंदी को उठाया है। भले ही आज जातिवाद के नाम से समाज में बहुत परिवर्तन हुआ हो, आज वे गुलामी की जंजीरें टूट चुकी हैं, लेकिन उन परिवारों पर हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी अत्याचार किसी हैवानियत से कम नहीं रहे हैं।
संग्रह की सशक्त कविताओं में ‘ब्रह्म-हत्या’, ‘सिरफिरे’, ‘विकासक्रम’, ‘वे बच्चे’, ‘शूद्र और उसका गांव’ नामक उल्लेखनीय कविताएं हैं। समानता और सम्मान प्रति हुंकार भरती कवि की वेदना सराहनीय है।
पुस्तक : बंद दरवाज़े कवि : जयपाल प्रकाशक : यूनिक, कुरुक्षेत्र पृष्ठ : 85 मूल्य : रु. 150.

