युवा कवि केतन यादव का सद्यःप्रकाशित कविता-संग्रह ‘एक चरवाहे का गीत’ की पहली कविता इसी शीर्षक से प्रारंभ होती है, जिसका समापन ‘एक शव का शोकगीत’ की चार लंबी कविताओं में होता है। चरवाहों के इर्द-गिर्द घूमती दर्जन भर कविताओं के साथ इनमें गांव-देहात का नॉस्टेल्जिया तथा प्रेम, प्रकृति और उदासी के मनोभाव समाहित हैं।
जंगल, चारागाह और गांव के प्रति कवि की चिंता और चिंतन इन कविताओं में स्पष्ट झलकता है— ‘सुना है बड़ी कंपनी ने खरीद लिया है जंगल, सरकार भी गरीबी और तंगी में होगी, अब न खेत बचे, न जंगल, न चारागाह, क्या खिलाकर जिलाएंगे मवेशियों को।’
बावजूद इसके, गांव के प्रति एक मोह हमेशा बचा रहता है और बची रहती है कुछ संजोए रखने की आशा व आकांक्षा— ‘गांव में अभी भी नदी जिंदा है... जिंदा है कुएं पर झाड़ में खड़ा रहट।’
फिर भी एक डर हमेशा बना ही रहता है— पहले चारागाह में कब्रें होती थीं, अब कब्रों में चारागाह है। हमारी पृथ्वी धीरे-धीरे कब्रगाह हो रही है और चारागाह दफ्न होते जा रहे हैं उसमें।’
बहरहाल, तमाम आशा-निराशा के बीच प्रेम के लिए जगह सुरक्षित है— ‘प्रेम की अतृप्ति में किया गया सबसे अधिक प्रेम, कुछ प्रेमी कुछ रिश्तों में किरायेदार बनकर रहे।’
एक अतिरिक्त छुअन, बैकअप, ओ शरद के सप्तपर्णी, हिंदी में रकीब, एकदम तुम्हारी तरह जैसी कविताओं में यह उम्मीदभरा प्रेम विभिन्न रूपों में परिलक्षित होता है, जबकि कमरा, आत्महत्या से ठीक पहले, बुद्ध की आत्महत्या, खाली जगहों के प्रेत आदि कविताएं उदासी और निराशा की नई परिभाषा गढ़ती हैं। इसे ‘पक्ष’ में यों स्पष्ट किया गया है— ‘सफेद न पूरी तरह सफेद है, न काला पूरी तरह काला। सफेद का कुछ हिस्सा काला है और काले का कुछ हिस्सा सफेद।’
पुस्तक : एक चरवाहे का गीत (कविता-संग्रह) कवि : केतन यादव प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 128 मूल्य : रु. 250.

