मध्यकालीन भक्ति काव्य की निर्गुण परंपरा के प्रखरतम कवियों में दादू, धन्ना, रामानन्द, कबीर और गुरु नानक आदि के साथ रैदास पर भी पर्याप्त साहित्य रचा गया है। रैदास पहले की तरह आज के परिप्रेक्ष्य में भी भारत समेत समूचे विश्व के लिए प्रासंगिक हैं। रैदास की वाणी और उपदेशों के प्रति जनप्रियता घटने की बजाय लगातार बढ़ रही है। समतावादी स्वराज्य के हिमायती एवं ढोंगियों की बखिया उधेड़ने वाले रैदास ने समाज में फैली बुराइयों, जैसे जातिवाद, छुआछूत, मूर्तिपूजा, जीवहत्या तथा दिखावे का ताउम्र डटकर विरोध किया।
गंगादास बासिया ने अपनी कृति ‘गुरु रविदास अमृतवाणी’ में रैदास के जीवन-चरित, रविदासिया धर्म और उनकी वाणी एवं साखियों की सटीक और विस्तृत व्याख्या की है। खास बात यह है कि पुस्तक में दिए गए तमाम पद और साखियां शब्दार्थ एवं भावार्थ सहित दी गई हैं ताकि वे आसानी से समझी जा सकें। कुछेक पदों, दोहों और साखियों को अंग्रेजी में भी अनूदित किया गया है। किताब में दी गई गुरु रैदास के जीवन से जुड़ी सामयिक घटनाएं बताती हैं कि उन्होंने देशव्यापी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी।
रैदास की गिनती मध्यकालीन भारत की बड़ी शख्सियतों में की जाती है। कबीर, गुरु नानक, मीराबाई, तुलसीदास और पीपा जैसे सत्यान्वेषियों के बीच उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी। सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए रैदास ने सामुदायिक भोजन ‘लंगर’ की प्रथा चलाई, जिसमें अमीर-गरीब सभी एक साथ मिलकर एक जैसा भोजन ग्रहण करें। उनका मानना था कि सबका सृजनहार एक ही है :
‘एकै माटी के सभ भांडे, सभ का एकै सिरजनहारा।
एकौ घट व्यापै रैदासा, सभ को एकै घड़ौ कुम्हारा।’
रैदास अपने पिता राहु की तरह काम करके अपनी जीविका चलाते थे। मेहनतकश वर्ग के लिए उनके मन में अपार सम्मान था। वे कहा करते थे कि जहां तक हो सके, आदमी को मेहनत करके पेट पालना चाहिए। निठल्ला बैठकर खाने को रैदास ने हेय समझा। श्रम को उन्होंने ईश्वर के बराबर दर्जा दिया।
बनारस के समीप ‘मंडुआडीह’ नामक गांव में जन्मे संत रैदास को आलोचकों ने स्वामी रामानन्द का शिष्य बताया है, जो सही नहीं है। रैदास ने एक साखी में अपने गुरु का नाम परमानन्द बताया है।
रैदास श्रमजीवी होने के नाते दिन भर काम करते थे। उनका व्यक्तित्व अतीव साधारण था। माला, तिलक और छापे आदि से उन्हें परहेज था। किंतु चित्रों में रैदास को तिलक, माला और प्रभामंडल से आभासित करके प्रस्तुत किया जाता है।
पुस्तक : गुरु रविदास अमृतवाणी लेखन-संपादन : गंगादास बासिया प्रकाशक : दीक्षित पब्लिकेशन्स, मेरठ, उ.प्र. पृष्ठ : 380 मूल्य : रु. 550.

