स्त्री-चरित्रों को सुंदरता से बयान करने वाली कहानीकार उज़्मा कलाम ने ‘काली बिल्लियों के साए में चटोरी चुड़ैल’ कहानी-संग्रह के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई है। पुस्तक की ग्यारह कहानियों में कहानीकार की प्रतिबद्धता रोज़मर्रा के जीवन, घरेलू संसार, हिंदू-मुस्लिम जातियों और समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों, स्त्री-अनुभव, व्यावसायिक समूहों, गैर-संगठित मज़दूरों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के समाजशास्त्रीय चित्रण में है।
घटनाक्रम और भाषा का गुम्फन ऐसा है कि बड़े ही सिनेमेटोग्राफिक तरीके से चाक्षुष बिंब अंकित होते जाते हैं और लगता है कि समाज, पास-पड़ोस, घर-परिवार की कहानियों ने आपको गिरफ़्त में ले लिया है। विषय और अभिव्यक्ति की रोचकता तथा भाषाई प्रभावमयता के कारण एक जादुई सम्मोहन आपको जकड़ लेता है।
उज़्मा कलाम की कहानियों में परिवेश, चरित्र, परिस्थिति और घटनाओं का प्रतिबिंबन बड़े प्रामाणिक ढंग से हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि विषयवस्तु उनके जीवन के इर्द-गिर्द से चयनित हुई हैं। इसलिए कथाविन्यास में बदलते जीवन-मूल्य, संबंधों का खोखलापन, पीढ़ियों के विरोधाभासी संबंध, अंतर्विरोध की जटिलता, स्त्री-पराधीनता और स्वतंत्रता की छटपटाहट, नैतिकता की बनिस्बत जीवन के सच का व्यवहार-सम्मत सामना करना और महानगरीय जीवन की त्रासद विडंबनाओं को विषयवस्तु के रूप में वर्णित किया गया है।
‘नाउम्मीदी कुफ्र है’ की फरखंदा और मीरा दो विपरीत छोर हैं—वुमन एम्पावरमेंट और परंपरावाद, जिसमें पति ही परमेश्वर है; ‘दो पर्दों के दरमियान’ की अमीरन और महरून; ‘वह थी’ की सदाबहार, समय के साथ परिवर्तनशील, प्रगतिशील नानी; मुगलसराय से आया ‘भड़भूंजा’—कामगार, बेरोज़गार और माइग्रेशन झेलता; ‘सालगिरह की शर्ट’ का दर्ज़ी रहमतुल्लाह—मॉल, शोरूम और ऑनलाइन खरीदारी के कारण दुकानदारी चलाने में असमर्थ होकर अब फेरी लगाने को मजबूर—आदि कहानियों के चरित्र एक ऐसे समाज का चित्र निर्मित करते हैं, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, स्मृति और वर्तमान, स्त्री और समाज के बीच निरंतर संवाद और संघर्ष चलता रहता है।
भाषा में हिंदी और उर्दू की शब्द-संपदा का स्वाभाविक समावेश न केवल भाषिक सौंदर्य उत्पन्न करता है, बल्कि भारतीय समाज की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को भी अभिव्यक्त करता है। कलाम की कहानियों में सहज प्रतीकों का उपयोग किया गया है; यथा—पर्दा सामाजिक दूरी और स्त्री-जीवन, काली बिल्लियाँ लोकविश्वास और भय, चुड़ैल स्त्री के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह को बताती है, चुड़ैल जैसी संज्ञाएं स्त्री को नियंत्रित करने का औज़ार हैं।
पुस्तक : काली बिल्लियों के साये में चटोरी चुड़ैल लेखिका : उज़्मा कलाम प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज पृष्ठ : 151 मूल्य : रु. 250.

