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रामायण का दार्शनिक दर्शन

पुस्तक समीक्षा

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शताब्दियों से जनमानस के जीवन को अपने आदर्शों से प्रभावित करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम राम के विराट जीवन को 5-7-5 की वर्णयोजना में लिखी जाने वाली ‘हाइकु’ जैसी संक्षिप्त कविता में समाहित करना असाध्य कार्य है किन्तु अप्रतिम प्रतिभा के धनी राधेश्याम जी ने हाइकु को ‘छन्द’ के रूप में अपना कर ऐसा विलक्ष्ण ग्रन्थ मां सरस्वती को भेंट किया, जिसका अन्य उदाहरण मिलना असम्भव है। उनके सुपुत्र रमाकान्त जी ने इस अद्वितीय कृति को सम्पादित कर न केवल अपने दिवंगत पिता को श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं बल्कि साहित्यकार पिता के लेखन को प्रकाशित कर एक अनुकरणीय मिसाल भी कायम की है।

‘वैदेही हाइकु उत्तर रामायण’ मां सीता के वन गमन की गाथा है। इस पूरी कथा में न तो राम सीता को लांछित करते हैं न ही सीता राम को दोष देती है। यदि कोई लांछित है तो वह है समाज जो सीता के चरित्र को ले कर अनावश्यक सन्देह करता है। सीता तो इसे विधि का विधान मानती है :- ‘बिधि रचई/ कब बिधि टरई/ जानहु तात।’ वह राम के प्रति आश्वस्त है : ‘भौन ते तज्यो/ तज्यो नाहि मन से/ मोहि बिस्वास’। कृति में वैदेही त्याग, पवित्रता, समर्पण, निष्ठा, बलिदान और साहस की प्रतिमूर्ति है : ‘सुजस लेहिं/ निज धर्म संवारि/ भार्या कै गर्व। अपनी दृढ़ता का परिचय देते हुए कहती है : ‘मुख मोड़ेउ/ जग संग जोड़ु/ दुख न मोहि।’ यहां सीता लोकहित की बात को अपने सुख से ऊपर रख कर ऐसा उदात्त चरित्र प्रस्तुत करती हैं जो उन्हें वन्दनीय बना देता है : ‘मोहि बिसारी/ लोकहित करिहैं/ मोहि न सोचु।’ वह प्रजा के लिए मंगल कामना करती है : ‘संकट मेघ/ कबहुं नहिं छाएं/ अवध राज।’

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इसमें राम के भीतर के द्वन्द्व, व्यथा, वेदना, विकलता का भी, गहराई से चित्रण है। हाइकु रूप में अवधी भाषा में प्रस्तुत ‘वैदेही उत्तर रामायण’ मात्र साहित्यिक कृति न हो कर एक दार्शनिक ग्रन्थ है।

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पुस्तक : वैदेही हाइकु उत्तर रामायण लेखक : राधेश्याम सम्पादक : रमाकान्त प्रकाशक : साउबरविट. नैट पृष्ठ : 201 मूल्य : रु. 300.

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