यह लघु उपन्यास नोबेल पुरस्कार विजेता, विश्वविख्यात लेखक मिख़अईल शोलअख़फ़ द्वारा लिखा गया है। यह द्वितीय विश्व-युद्ध की विभीषिका की सच्ची कहानी है, जो मानवीय जिजीविषा और मानवता पर मनुष्य के विश्वास को पूरी तरह से अभिव्यक्त करता है। पुस्तक रूसी ग्रंथमाला के सम्पादक अनिल जनविजय द्वारा हिंदी में तैयार की गई पुस्तकों की एक कड़ी है।
उपन्यास की कथा रूस-जर्मनी युद्ध की पृष्ठभूमि में कथावाचक अन्द्रेय नामक ड्राइवर और अनाथ बच्चे के साथ बिताए क़हर के दिनों पर आधारित है। वर्ष 1939 में छिड़े विश्व-युद्ध में घायल अन्द्रेय को जर्मन सैनिकों द्वारा कैदी बनाने से लेकर 1944 तक की लोमहर्षक कथा पाठक को बांधती, हतप्रभ और युद्ध के अमानवीय पक्षों से रू-ब-रू भी कराती है। गाली-गलौज करना, निर्मम पिटाई करना, तेज़ न चल पाने वाले घायलों को गोली मारना, लकड़ी का बुरादा मिली रोटी देना, शाम को भूखा रखना, पेशाब-पाखाना के लिए मनाही, रोज़ चार घन मीटर पत्थर तोड़ना, कतार में खड़े कर हर दूसरे आदमी की नाक पर प्रहार कर खून की धार बहाना।
कुल मिलाकर रूसी सैनिकों से हुए जानवरों से भी बदतर व्यवहार को भयावह स्थितियों के बीच दृढ़ता से चित्रित किया है। अंत में रूस की धरती पर जैसे-कैसे पहुंच कर अन्द्रेय को पता चलता है कि उसका परिवार और मकान बम-धमाके में ख़त्म हो गए। तब कथावाचक अनाथ बच्चे को बेटा बना लेता है।
इस पुस्तक का मूल रूसी से हिंदी में अनुवाद गोपीकृष्ण गोपेश ने किया है, जो इतना सहज है कि अनुवाद लगता ही नहीं। भाषा इतनी सरल है कि प्राथमिक हिंदी जानने वाला भी समझ जाए।
पुस्तक : इनसान का नसीबा लेखक : मिख़अईल शोलअख़फ़. अनुवाद : गोपीकृष्ण गोपेश संपादक : अनिल जनविजय प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली पृष्ठ : 63 मूल्य : रु. 99

