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पासवर्ड

लघुकथा

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मैं, शाहजहांपुर जाने के लिए ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था, तभी मेरी उस पर नज़र पड़ी थी, पंजाब मेल से बरेली उतरने के बाद वह हक्का-बक्का-सा प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, मानो समझ न पा रहा हो कि जाए तो जाए कहां। उसने जींस-जैकेट पहन रखी थी और हाथ में एक ब्रीफकेस था। ज़हरखुरानी के शिकार यात्री अक्सर स्टेशन पर दिख जाते थे, पर वह उनसे अलग पूरे होशो-हवास में था। वह कभी सीढ़ियों की ओर जाता, कभी टहलने लगता और कभी बेंच पर बैठकर पहलू बदलने लगता। समय के साथ-साथ उसके चेहरे पर घबराहट के भाव बढ़ते जा रहे थे।

मेरी ट्रेन एक घंटा लेट थी। मैंने उसे संकेत से अपने पास बुलाया, तो वह सकपकाया-सा मेरे पास आ खड़ा हुआ।

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‘क्यों परेशान हो?’

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‘भाई! मेरी मदद करो’, रुआंसे होकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, ‘मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा कि मैं कौन हूं, बहुत देर से याद करने की कोशिश कर रहा हूं।’

‘ऐसा कैसे हो सकता है’, मुझे हैरानी हुई, ‘जेब में कोई आईडी होगी, देखो।’ उसने कांपते हाथों से अपने खाली जेब मेरे सामने उलट दिए,ज ेब से एक कागज की पर्ची जमीन पर गिरी। उस पर एक फोन नंबर लिखा था।

‘किसका है? तुम्हारे पास फोन है? मिलाकर देखो।’ उसने अपना फोन मुझे थमा दिया, पर उसे खोलने का ‘पासवर्ड’ उसे याद नहीं था। इसलिए फोन उसके किसी काम का न था। वह बहुत घबरा रहा था।

‘तुम किसी को फोन नहीं कर सकते, पर परिवार से किसी का तो आ सकता है, उससे तुम्हारी पहचान हो जाएगी।’ मैंने उसे तसल्ली दी।

‘परिवार!!!’ उसने मूर्खों की भांति जिस तरह पलकें झपकाईं, उससे स्पष्ट था कि वह अपनी याददाश्त पूरी तरह खो चुका था।

‘ब्रीफकेस खोलो, शायद अंदर के सामान को देखकर तुम्हें कुछ याद आ जाए।’ लेकिन फिर वही दिक्कत कि ब्रीफकेस को खोलने के लिए पासवर्ड की जरूरत थी, जो वह भूल चुका था।

फोन नंबर वाली पर्ची मेरे हाथ में थी। मैंने अपने मोबाइल से वो नंबर मिलाया। दूसरी ओर मशीन थी -हिंदी में बात करने के लिए एक डायल करें, अंग्रेजी में बात……। सातवां ऑप्शन कस्टमर केयर अधिकारी से बात करने का था। मुझे कुछ आशा जगी थी, लेकिन दूसरी ओर से आगे बढ़ने के लिए चार अंकों का पासवर्ड मांगा जा रहा, जो सिर्फ वही जानता था।

मेरी ट्रेन भी आने वाली थी। मुझे ड्यूटी पर शाहजहांपुर पहुंचना था। मैं उसके लिए और अधिक नहीं रुक सकता था।

मुझे उसे रेलवे पुलिस तक सुरक्षित पहुंचा देना ही सुरक्षित विकल्प लगा।

जब मैं उसे लेकर थाने पहुंचा, तो थानेदार मुझसे ही सवाल-जवाब करने लगा, ’यहां क्यों उठा लाए इसे, समाज सेवा का भूत सवार है, तो अपने घर ले जाते, यहां तो रोज ही ऐसे केस आते हैं। क्या पता साला किसी मकसद से नाटक ही कर रहा हो!’ तभी उसकी नज़र उसके मोबाइल और सूटकेस पर पड़ी, तो वह नरम पड़ गया, ‘आप जा सकते हैं, हम देखते हैं, क्या किया जा सकता है।’

शाम को मैं पैसेंजर ट्रेन से लौट रहा था, ट्रेन किसी छोटे से स्टेशन पर खड़ी थी, तभी मेरी नज़र सामने की लाइन पर बरेली से वाया शाहजहांपुर जाने वाली लोकल पर पड़ी। ट्रेन धीरे-धीरे रेंग रही थी। एक खल्लासीनुमा रेलवे कर्मी एक आदमी को लट्ठ से ठेलते हुए जबरन ट्रेन पर चढ़ा रहा था।

उस आदमी के जिस्म पर जांघिए के सिवा कुछ न था। लट्ठ के डर से ट्रेन पर चढ़ने के बाद उसने चेहरा घुमाया तो मैं ठगा-सा रह गया.... अविश्वसनीय!! यह वही आदमी था, जिसे मैं सुबह थाने में इंस्पेक्टर के सुपुर्द कर आया था।

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