पुस्तक समीक्षा

अतीत के पन्ने और समृद्ध विरासत

अतीत के पन्ने और समृद्ध विरासत

मोहन मैत्रेय

आलोच्य पुस्तक में मनजीत कौर ‘मीत’ ने कालक्रमानुसार मुगल शासकों का विवरण, मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के अत्याचारों का कच्चा चिट्ठा तथा दस गुरुओं की देन को विशेष रूप से रेखांकित किया है। लेखकीय कथन से इतर वास्तविकता तो यह है कि सिख गुरुओं, विशेष रूप से सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव तथा दशम गुरु गोविन्द सिंह विषयक अनेक भाषाओं में अनेक ग्रन्थ, शोधपत्र आदि प्रकाशित हो चुके हैं।

लेखिका ने ‘पहली पातशाही’ अध्याय में ही गुरु नानक देव जी के विभिन्न उल्लेखों के माध्यम से मुगलों की धार्मिक अनुदारता, अत्याचारों की पोल खोल दी है।

पुस्तक में उल्लेख है कि गुरु जी ने 38 हजार मील की ये यात्राएं पैदल कीं। इन यात्राओं से कई चमत्कारिक प्रसंग भी जुड़े हैं। अपना उत्तराधिकारी बनाते हुए गुरु जी ने भाई लहणा को अपने अंग लगाकर गुरु अंगद बना दिया।

तीसरे गुरु अमरदास ने गोइंदवाल को धर्म क्षेत्र का रूप दिया। यहां 84 सोपानों वाला बाऊली का निर्माण हुआ, जो प्रतीकात्मक था। लंगर ने महान संस्था का रूप ले लिया। बाऊला के उद‍्घाटन के समय आपने चारों वर्णों के लोगों को एक ही पंक्ति में बिठा कर भोजन करवाया।

पांचवें गुरु अर्जुन देव की देन चिर स्मरणीय रहेगी। यह देन थी स्वर्ण मंिदर के सरोवर के मध्य ‘हरि मंिदर’ का निर्माण, गुरु वाणी का सम्पादन, दिल्ली के मुगल शासकों की मंशा को समझकर भावी पीढ़ी को सैन्य-बल प्रशिक्षण। वर्ष 1589 ई. में लाहौर के प्रतिष्ठित पीर मियां मीर से ‘हरि मंदिर’ की नींव रखवाई। छठे गुरु हरिगोबिन्द सिंह के समय घोड़ों और शस्त्रों की भेंट तथा खरीद सिख संगतों के सैन्यकरण का श्रीगणेश था। संगत गुरु श्री हरि राय में कोमलता एवं शक्ति का सुमेल था। 1661 ई. में शरीर त्याग से पूर्व अपने पांच वर्षीय पुत्र हरिकृष्ण को अपना उत्तराधिकारी बनाया। ‘हिन्द की चादर’ के रूप में विख्यात गुरु तेग बहादुर 1621 ई. में नौवें गुरु बने। दशम गुरु गोबिन्द सिंह सन्त सिपाही दृढ़ संकल्पी महापुरुष थे। आदि ग्रन्थ में नवम गुरु की जोड़ ‘गुरु ग्रन्थ’ को गुरु रूप दिया-‘गुरु ग्रन्थ ही मानिये। प्रगट गुरां का देह’ देहधारी गुरु परम्परा समाप्त कर दी। अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध आपने खालसा सृजन किया। ‘...चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊं’ यह संकल्प पूरा किया। चारों पुत्रों की शहीदी पर कहा : इन पुत्रन के सीस पै, वारे दिये सुत चार! चार मुरा तो क्या यथा जीवित कई हजार। यह था उनका दृढ़ संकल्प!

टाइटल पेज पर ‘गुरु के स्थान पर ‘गुरू’, ‘वह’ के स्थान पर ‘वोह’ प्रयोग शब्दों का उपयोग व विराम चिन्हों का यथास्थान न होना अखरता है। सामग्री-चयन सराहनीय है।

पुस्तक : सिक्ख गुरु साहिबान और मुगल साम्राज्य लेखिका : मनजीत कौर ‘मीत’ प्रकाशक : बुक्स क्लिनिक प्रकाशन, छत्तीसगढ़ पृष्ठ : 263 मूल्य : रु. 255.

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