लघुकथा परिदृश्य का अवलोकन

पुस्तक समीक्षा

लघुकथा परिदृश्य का अवलोकन

अशोक भाटिया

सत्तर के दशक में नवरूप में उभरी लघुकथा, लेखकों और पाठकों के लिए, सुपरिचित विधा बन चुकी है। हिन्दी में लघुकथा के चिंतन पक्ष पर बहुत कम काम हुआ है। जो हुआ है, उसमें संजोने लायक कम है, परिपक्व दृष्टिकोण के साथ समग्र परिदृश्य को पकड़ने के प्रयास बहुत कम मिलते हैं। ऐसे में जितना भी गंभीर कार्य हुआ है, उसे सहेजकर विमर्श को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

सत्तर के दशक से लघुकथा लेखन और संपादन के क्षेत्र में जो थोड़े से कथाकार निरन्तर सक्रिय रहे हैं, उनमें डॉ. कमल चोपड़ा का नाम आदर के साथ लिया जाता है। अस्सी के दशक में वे प्रत्येक दो वर्ष की प्रतिनिधि लघुकथाओं को पुस्तकाकार सामने लाते रहे। अब 2008 से हर वर्ष के लघुकथा-साहित्य को ‘संरचना’ नाम से सामने ला रहे हैं।

‘लघुकथा : सृजनात्मक सरोकार’ पुस्तक में डॉ. कमल चोपड़ा द्वारा समय-समय पर लिखी गई 28 टिप्पणियां/ आलेख शामिल हैं। इनमें ‘प्रतिवाद’ (1981), ‘अपवाद’ (1986), ‘अपरोक्ष’ (1989) आदि की भूमिकाएं हैं तो ‘संरचना’ (वार्षिकी) के चौदह अंकों के संपादकीय भी शामिल हैं। इनमें विषयगत विविधता की दृष्टि से, लघुकथा में नवीनता की तलाश, कथापन की प्रतिष्ठा, लघुकथा की साहित्यिकता, लघुकथा में संघर्ष-चेतना, नज़रअन्दाज़ होते अवयवों की सूक्ष्मदर्शी पकड़, सुनियोजित हिंसा बनाम सांप्रदायिकता, त्रासद समय में नई संभावनाएं, ग्रामीण लघुकथाएं, अनुभव की गहनता और सघनता आदि प्रमुख हैं। शिल्प-पक्ष पर ‘व्यंजना-शक्ति का सृजनात्मक रूप’, ‘सृजनधर्मिता और प्रयोगधर्मिता’ जैसी टिप्पणियां भी हैं। एक-दो उदाहरण देखें। ‘हालात’ (1981) की भूमिका’ में वे लिखते हैं- ‘लघुकथा अब किन्हीं निहत्थे स्वरों की अनुगूंज-मात्र न रहकर स्वस्थ साहित्यिक धारा बन गई है।’

डॉ. कमल चोपड़ा की यह पुस्तक लघुकथा के परिदृश्य का विहंगम अवलोकन है।

पुस्तक : लघुकथा : सृजनात्मक सरोकार लेखक : डॉ. कमल चोपड़ा प्रकाशक : दिशा प्रकाशन, दिल्ली पृष्ठ ः 152 मूल्य : रु. 400.

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