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एक था प्रेम

लघुकथाएं

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चित्रांकन संदीप जोशी
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एक था प्रेम। वह धर्म और जाति का परचम लहराने वालों को बिलकुल पसंद नहीं था। लेकिन धर्म और जाति के विरोध के बावजूद प्रेम जब-तब, जहां-तहां, जिस-किसी के भीतर बादलों की तरह उमड़-घुमड़ आता और बरसने की फ़िराक में रहता।

प्रेम के ख़िलाफ़ धर्म-जाति के कर्णधारों ने नियम बनाए, सरकार ने कानून बनाए। पर प्रेम था कि कि किसी के रोके रुक नहीं रहा था। वह तो अबाध गति की नदी जैसा था।

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आखिर समाज और सरकार ने मिलकर प्रेम पर शिकंजा कसना शुरू किया। किसी भी युवक-युवती में प्रेम की लहर का संदेह होने पर भी पकड़ लिया जाता और सज़ा सुना दी जाती।

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लेकिन प्रेम की जड़ें तो घास की तरह थीं। जिधर देखो, उधर ही उगती दिखने लगतीं।

न प्रेम कभी उनके वश में आया, न समाज अपने को बदल पाया। कशमकश जारी है...।

चमक

बूढ़ी बीमार मां को उनका बेटा गली में घुमा रहा था। बेटा नहीं, भावना घुमा रही थी। उसी समय उस गली का राकेश कोई एक बरस बाद लौट रहा था। राकेश ने सामने मां जी को देखा तो रिक्शा से उतरकर मां जी के पैर छुए। मां की बूढ़ी आंखें उसे पहचान नहीं सकीं। तब बेटे ने मां को राकेश के बारे बताया।

सुनकर मां जी का गठिया-भरा कांपता हाथ उठा। नहीं, मातृत्व का हाथ उठा। फिर जैसे-कैसे राकेश के सिर तक पहुंचा। सिर को पलोसा। राकेश ने वह सूखी हड्डियों वाला हाथ दोनों हाथों में लिया और उसे थपकने लगा। नहीं, मातृत्व-भाव को थपकने लगा। उस बूढ़े हाथ में भावना की नदी का प्रवाह था। राकेश ने देखा, बूढ़ी आंखों में उस नदी की गहरी चमक उभर आई थी।

थाली और बैंगन

एन. मुन्तज़िर नाम के एक लेखक को एक संस्था ने एक लाख के कबीर सम्मान से नवाज़ दिया। छुटभैये लेखकों के दिलों में भट्ठियां सुलग उठीं–

‘मुसलमान ही मिला था इनाम के लिए!’

कबीर के नाम पर सम्मान रखा है तो मुस्लिम को ही देंगे न!

निर्णायक समीति में भी मुसलमान ही रखे गए होंगे। तभी ऐसा निर्णय हुआ होगा।

कुछ दिन बाद मीडिया में आया कि एन. मुन्तज़िर तो उसका लेखकीय नाम है, वैसे वह हिन्दू हैं।

भट्ठियों ने फिर ‘अग्नि धर्म’ निभाया।

तभी कहें, इतना ब्रिलियंट लेखक मुसलमान नहीं हो सकता।

सांप्रदायिक समस्या पर इतना शानदार उपन्यास! कोई मुसलमान क्या खाकर लिखेगा ऐसा! वे तो खुद सांप्रदायिक होते हैं।

वैसे इसे मुस्लिम नाम रखने की जरूरत ही क्या थी?

कुछ दिन बीतते, न बीतते खोजबीन के बाद पता चला कि एन. मुन्तज़िर उसका असली नाम ही है। भट्ठियों में नया ईंधन पड़ गया–

पक्का सिफारिशी होगा।

इधर-उधर से मारकर लिखा होगा।

संस्था को इतने सारे हिन्दुओं में सम्मान के लायक कोई लेखक नहीं मिला?

आग अब कहीं और सुलगने की तलाश में है।

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