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शगुन

लघुकथा

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नई बहू कार में ही बैठी थी। उसके गृह-प्रवेश और स्वागत की तैयारी पूरी हो चुकी थी। बहनें, भाभियां व घर की अन्य रिश्तेदार महिलाएं परिवार की रस्म के अनुसार एक तश्तरी में पूड़ी और मिठाई रखकर नववधू को एक ‘मीठाग्रास’ खिलाने की रस्म निभाने के लिए कार में बैठी बहू की तरफ़ लपकी जी रही थीं। दुल्हन का मुंह बार-बार मिठाई और पूड़ी से ठूंसा जा रहा था।

छोटी नन्दिया की बारी आई। वो भी मीठे की तश्तरी लेकर कार की तरफ़ लपकी।

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दुल्हन ने मीठा और न खिलाने की विनती करते हुए हाथ के इशारे से मना कर दिया। छोटी नंद मुस्कान के साथ बोली,

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‘नहीं खिला रहे हम आपको शगुन का कौर, इतना खाएंगी कैसे आप बोलिए भला? पेट न फट जाएगा आपका?’

सहानुभूति के चार शब्द सुनकर नई भाभी की आंखें झरने लगीं थीं... आंसू चुपचाप उनके गालों पर ढुलक रहे थे।

‘अब क्या करिएगा आप बोलिए?’

भाभी तनिक-सा सोच कर धीरे से बोलीं, ‘आप ही खा लो न जिज्जी।’

और नई दुल्हन के मेहंदी रचे हाथों से नन्दिया ने, पूड़ी और बरफ़ी से अपना मुंह भर लिया और गपागप खा गई...। उसे भी स्पेशल फ़ील हो रहा था। उसका चेहरा भी दुल्हन जैसा लाल हो उठा था...।

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