सोनी ने हांफते-हांफते अपने क्वार्टर में तेज कदमों से छलांग लगा ली। जोर से पुकारा—बापू... अरे ओ बापू... कहां हो तुम।
अंदर से आवाज आई... के है छोरी, काहे चिल्लावत हैं। सांस क्यों फूल रही हंै तेरी।
सोनी बोली, अब तो ऐसा हुआ है कि मैं बहुत खुश हूं।
के बात? बापू ने पूछा।
अरे बापू... आज से हम भी बड़े लोगों की गिनती में आ गये हैं...।
बापू बोला, पगला गई है।
ना बापू तुम्हें याद है कि जब कान्ता मौसी का बी.पी. बहुत हाई था, डाॅक्टर ने कई-कई दवाइयां दी थीं। तब आपने कहा था कि ये ऐसी-ऐसी बीमारियां अमीरों और बड़े लोगों के होती हैं...।
आज जब मां शीला जी के घर बर्तन मांज रही थी तो उनको चक्कर आया। मैं देखकर आई हूं। मौसी ने मशीन लगायी, बोली—हाई बी.पी. है। सोनी तुम जाओ।
तो बताओ बापू—हम भी अमीर और बड़े लोगों की गिनती में आ गये न?
पतंग
आज वीरो सुबह से ही मुंह फुलाये बैठी हैं। मां... ओ झाई जी, मैंनूं कुछ नई पता... अज ते मैं पतंग उड़ावांगी।
कुड़ी पागल हो गयी लगदी-ए। मां ने बोला।
नई झाई, कान्ता ते मीरा बी कल पतंगा उड़ानगियां!
बस... कह दित्ता जां कह दित्ता! पतंग उड़ावांगी!
झलिये, तू कुड़ी-ए। गुड्डे-गुड्डी दा ब्याह कर। बाकी किन्ने सारे खेल ने जां खेड!
वीरो रूआंसी हो गयी। पड़ोस की दीवार से पवन सब सुन रहा है!
अपने कमरे में गया! डोर और पतंग ले आया!
वीरो की बांह पकड़ कर बोला चल वीरो पतंग उड़ावांगे!
वीरो खुश!
पतंग आसमान में लहरा रही है।

