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उम्रदराज प्रेम

लघुकथा

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वह अक्सर अपनी बहू के हाथ की लिखी पर्ची के साथ दुकान पर आती थी। सामान लेती और उसी पर्ची पर बिल बनवाकर ले जाती। परन्तु हर बार सामान लेने के पश्चात धीरे से कहती...

‘पा जी (भाई जी) खट्टी-मीठी गोलियां हैं!’

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‘हां है न...।’

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‘कितनी दूं...।’

‘बस दो... पर पैसे नहीं दूंगी।’

‘कोई बात नहीं... ले लो...।’

‘पा जी... मेरी बहू से मत कहना।’

‘नहीं कहूंगा...।’ दुकानदार ने हंसते हुए कहा।

‘दो ही क्यों...?’

‘इक तुहाडे पा जी नू दवां गी।’

वह उस खट्टी-मीठी गोलियां लेकर उसके चेहरे पर आई मुस्कान को देखकर बस संतुष्ट होता रहता।

आज वह सुबह ही सुबह आ गई...

‘पा जी वह एक दस रुपये वाला सूप का पैकेट दे दो... तीखा बने....वही देना...।’

उसने दस रुपये पकड़ाते हुए कहा।

‘...मेरी बहू से मत कहना...।’

‘क्यों...?’

‘अज्ज वह बाजार गई है और तुहाडे पा जी दा बड़ा दिल करदा है...।’

‘करारा है न...।’

‘हां...।’

‘आज गोलियां नहीं लेनी...’

‘बाद में...।’

वह जल्दी से उसे अपनी चुनरी में लपेट कर इधर-उधर देखकर चल दी। वह उस के चेहरे पर पति के लिए आये प्रेम के भाव को पढ़कर लम्बा सांस लेता है। आखिर ऐसा क्यों...? इस उम्र में भी किसका डर...?

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