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जाल

कविताएं

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जो बुना गया, वह इतना

महीन था कि

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दिखता नहीं था।

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उसे छूने से पता चलता,

लेकिन छूने में

किसी की दिलचस्पी नहीं थी।

इस तरह बुना गया एक जाल

गिराया गया पानी के बीचोंबीच।

इस तरह जलकुंभी आईं।

इस तरह अंधेरा आया,

पानी की शक्ल बदलता।

जब उतरने लगे लोग पानी में,

तो गिरने लगे, घिरने लगे,

डूबने लगे, जाल में फंसते हुए।

बाद में मछलियों की जगह

निकलने लगीं लाशें।

वह जाल पानी के भीतर

जितना था,

उससे ज्यादा मजबूती से

बांध दिया गया था

पानी से बाहर।

खिड़कियां

यह घर जिसने बनाया,

वह छोड़ना भूल गया जमीन

बित्ता भर भी।

अब उसके लिए मुसीबत यह है कि

खिड़कियां नहीं खोल सकता।

खिड़कियां नहीं खोल सकता,

तो आसमान नहीं देख सकता,

चिड़िया को नहीं बुला सकता,

धूप को नहीं सुला सकता फर्श पर।

बिना खिड़कियों के उसका घर

डूबा रहता है अंधेरे की नदी में

चौबीसों घंटे सातों दिन।

खबर-बेखबर

जो कुछ छपता है,

वह दुनिया जानती है।

लोग पढ़ते हैं, पूछते हैं

एक-दूसरे से।

फिर पता करते हैं कि

सच क्या है यहां-वहां से।

खबरों से घिरे हुए लोग

घिरे हुए हैं चारों तरफ से।

अखबार की कतरनें

हवा में उड़ रही हैं,

अफवाह उड़ रही है,

डर फैल रहा है,

खुशी कम हो रही है।

लोग खुश होना तो चाहते हैं,

लेकिन खुश दिखना नहीं चाहते।

न जाने कौन-सा तनाव है,

न जाने कौन-सी चिंता,

जो नमक की तरह गलाती जाती है

एक मजबूत देह को।

अखबार में सब कुछ है,

बस उस डर का कोई जिक्र नहीं,

जो खा जाता है एक दिन

पूरे परिवार को।

फिर अगले दिन अखबार में

उसकी कोई खबर नहीं होती।

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