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मोये

लधुकथा

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बाबू रामसहाय को अपनी घरेलू परिस्थितियों के कारण छप्पन वर्ष की आयु में हरदोई से लखनऊ की डेली पैसेंजरी करनी पड़ रही थी। यह दौर बड़ा कष्टकारी था। अपने सहयात्रियों के साथ आरक्षित बोगियों में न चाहते हुए भी नियम विरुद्ध यात्रा करते हुए बहुत असहज महसूस करते थे। सबसे अधिक दहशत उन्हें साथ चलने वाली युवा दबंगों की टोली से होती थी, जो दैनिक यात्रियों के नाम पर कलंक थे, जिन्हें किसी की भी इज्जत उतारने में देर नहीं लगती थी। उनकी कोशिश रहती थी कि उनसे सामना ही न हो, कई बार वह उनके डर से बोगी तक बदल लेते थे।

आज उस टोली को अपनी बोगी में चढ़ते देख वह मन ही मन कांप गए। दैनिक यात्रियों की वो टोली गेट पर खड़ी थी, ट्रेन रेंगने लगी थी। एक ग्रामीण औरत और उसकी जवान बेटी रेंगती गाड़ी में चढ़ने का प्रयास कर रहे थे।

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‘भैया, ये रीज़ब (रिज़र्ब) डिब्बा तो नहीं है?’ औरत ने गेट घेरे खड़े युवक से पूछ लिया।

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‘अरे हमारे रहते क्यों चिंता करती हो’, लड़के ने उसकी जवान बेटी को हाथ पकड़कर ट्रेन में खींचते हुए कहा, ‘बहुत आराम से ले जाएंगे।’ पीछे-पीछे औरत भी बोगी में चढ़ आई थी।

वो वातानुकूलिक बोगी थी। दैनिक यात्रियों की भीड़ को डिब्बे में चढ़ते देखकर उसमें यात्रा कर रहे यात्रियों ने अपनी चादरें सिर तक ओढ़ ली थीं, मानो गहरी नींद में सो रहे हों। रामसहाय भी अखबार पढ़ने का नाटक कर रहे थे।

देहाती औरत और उसकी बेटी उन युवकों के बीच घिरे हुए थे। उनके कुछ साथी ‘साइड अपर’ सीट पर बैठे थे, वहां तिल भर भी जगह नहीं थी।

‘बिटिया थक जाएगी, इसे यहां भेज दो। हम आराम से बिठा लेंगे।’ वहां बैठा एक लम्पट किस्म का लड़का बोला।

‘भैया, वहां जगह कहां है, हम यहीं ठीक हैं।’ भोली-भाली ग्रामीण औरत ने कहा।

‘अरे, जगह ही जगह है, देखो...’ उसी लड़के ने अपने बगल में बैठे साथी को अपनी गोद में बिठाते हुए कहा।

लड़की संकोच कर रही थी, बचाव के लिए अपनी मां की ओर देख रही थी।

उस टोली का ये रोज का काम था। आंखों-आंखों में इशारे हुए, सुनियोजित तरीके से आनन-फानन में उन्होंने लड़की को ऊपरी बर्थ पर चढ़ा दिया। ये देखकर दूर खड़ा उनका एक साथी चिल्लाया, ‘अबे, हम भी हैं।’

गाड़ी के गति पकड़ते ही वे लड़की से अश्लील हरकतें करने लगे। लड़की अपने आप में सिकुड़ती जा रही थी। उनकी हरकतें बढ़ने लगी तो वो रुआंसी होकर मां से बोली, ‘मां, मुझे नहीं बैठना इनके बीच, नीचे आना है।’

मां को पूरी बात समझते देर नहीं लगी, वह शेरनी की तरह लपकी, ‘थल्ले (नीचे) आ जा पुत्तर!’ और बेटी को नीचे उतार लिया। मां की आंखों से चिंगारियां-सी निकल रही थीं। उसने घृणा-भरी नज़रों से उन बेशर्मी से हंसते लड़को को देखा, फिर वातानुकूलित बोगी में सिर तक सफेद चादर ओढ़े यात्रियों पर निगाह डाली और चिल्लाकर बोली, ‘मोये!!’

बाबू रामसहाय के पास बैठे सहयात्री ने फुसफुसाकर उनसे पूछा, ‘मोये! ...इसका क्या मतलब हुआ?’

‘मरे हुए!’

‘कौन?’

‘हम-सब, और कौन!!’ डबडबाई आंखों को अखबार में छुपाए रामसहाय फट पड़े।

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