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मां पूजा का थाल

मातृ दिवस आज

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मां पूजा का थाल है, मां दीये की आग,

रहती है मां जब तलक, बुझते नहीं चिराग।

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मां चंदन की गंध है, मां रेशम का तार,

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बंधा हुआ जिस तार से, सारा ही घर-द्वार।

जगह-जगह तीर्थ करो, फिरो सुबह से शाम,

मां के चरणों-सा नहीं, दूजा कोई धाम।

मां की ममता का नहीं, इस धरती पर मोल,

शीशनवत‍् इतिहास है, बलिहारी भूगोल।

शीश नवाते घूमते, गये अनगिनत धाम,

मां के दिल को दुख दिया, सभी तीर्थ निष्काम।

बेटे के पांवों चुभी, एक तनिक-सी फांस,

मां का दिल घायल हुआ, तेज हो गईं सांस।

मां थी घर में जब तलक, जुड़े रहे सब तार,

मां के जाते ही उठीं, आंगन में दीवार।

यहां-वहां, सारा जहां, नापें अपने पांव,

मां के आंचल-सी नहीं, और कहीं भी छांव।

रिश्तों का इतिहास है, रिश्तों का भूगोल,

सम्बंधों के जोड़ का, मां है फेवीकोल।

मां मन्दिर का दीप है, मां पूजा का थाल,

जिसे दुआ मिलती रहे, सदा रहे खुशहाल।

मां के रहते कब गया, कोई खाली हाथ,

मुट्ठी में दे प्यार से, भेंट दुआ के साथ।

नेकी करके डालना, दरिया में तुम लाल,

मां ने दी इसके लिए, सौ-सौ नई मिसाल।

मां ने बचपन में दिए, जो-जो हमें उसूल,

जीवन में वे सर्वदा, बनकर महके फूल।

जीवन की इस राह में, जब-जब तपती धूप,

तब-तब मां लेती दिखे, इक बदली का रूप।

जीवन में यूं तो रहे, रिश्तों की भरमार,

लेकिन सबसे श्रेष्ठ है, ‘अंजुम’ मां का प्यार।

बहुत छिपाए, कब छिपे, अंजुम जी हालात,

चेहरे से पढ़ ली सदा, मां ने मन की बात।

मां चंदा की चांदनी, पिता सूर्य का नूर,

राह दिखाते हैं सदा, अब दिल्ली क्या दूर।

मां पूनम का चांद है, पिता शरद की धूप,

दोनों के आशीष से, जीवन ले नवरूप।

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