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मां तुम्हारा चूल्हा

कविता

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मां,

बंद होने वाला है तुम्हारा चूल्हा,

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जिसमें झोंक कर

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पेड़ की सूखी डालियां

पकाती हो तुम खाना।

कहा जा रहा है

तुम्हारा चूल्हा नहीं है

पर्यावरण के अनुकूल।

मां,

मुझे याद है, बीन लाती थी तुम

जंगलों, बगीचों से गिरे हुए पत्ते,

सूखी टहनियां जलावन के लिए।

नहीं था तुम्हारे संस्कार में

तोड़ना हरी पत्तियां।

जब भी टूटती थी कोई हरी पत्ती,

तुम्हें उसमें दिखता था

मेरा मुरझाया चेहरा,

जबकि

कहा जा रहा है

तुम्हारे संस्कार नहीं हैं

पर्यावरण के अनुकूल।

तुम्हारा चूल्हा

प्रदूषित कर रहा है

तीसरी दुनिया को।

पहली और दूसरी दुनिया के लोग

एक जुट हो रहे हैं,

हो रहे हैं बड़े-बड़े सम्मेलन

तुम्हारे चूल्हे पर,

तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर,

हो रहे हैं तरह-तरह के शोध,

मापे जा रहे हैं कार्बन के निशान

तुम्हारे घर आंगन की

हवाओं में।

वातानुकूलित कक्षों में

हो रही है जोरदार बहसें,

कहा जा रहा है कि

तुम प्रदूषित कर रही हो,

अपनी धरती गर्म कर रही हो,

विश्व को और

तुम्हारे चूल्हे की ओर से

बोलने वाले

घिघियाते से प्रतीत होते हैं,

प्रायोजित से लग रहे है

शोध अनुसंधान

और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी।

मां!

मौन हैं सब, यह जानते हुए कि

जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां

जलाओगी तुम, उतना कार्बन

एक भवन के केन्द्रीयकृत

वातानुकूलित यंत्र से

उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में।

वे लोग छुपा रहे हैं तुमसे तथ्य भी,

नहीं बता रहे कि तुम्हारा चूल्हा

कार्बन न्यूट्रल है,

क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में

जलावन न भी जले, फिर भी

कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही,

लकड़ियों से बस उसकी गति होगी

थोड़ी कम और तुम्हारा ईंधन तो

घरेलू है, उगाया जा सकता है,

आयात करने की ज़रूरत नहीं।

लेकिन बंद होना है तुम्हारे चूल्हे को,

तुम्हारे अपने ईंधन को,

और जला दी जाएगी

तुम्हारी आत्मनिर्भरता,

तुम्हारे चूल्हे के साथ ही।

मां! एक दिन

नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा।

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