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मां और ईश्वर

कविताएं

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मां ने पूछा,

कैसे हो तुम?

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मैंने मां से पूछा,

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तुम कैसी हो?

मां चुपचाप रही।

मां ने पूछा,

खाना खा लिया?

मैंने मां से पूछा,

तुमने खाना खा लिया?

मां चुप रही,

मैं जानता हूं,

मां ने अभी पूजा भी

नहीं की है,

मैं जानता हूं,

मां, पूजा करके

पहले ईश्वर को

भोग लगाती है,

उसी दाल और रोटी की,

जिसे मां चाहती है,

मैं खा लूं,

मां से पहले और

ईश्वर से पहले भी।

मां, ये नहीं जानती,

उसके सुबह से भूखे

ईश्वर मुझसे नाराज़

हो सकते हैं।

फिर भी,

मां जानती है,

जब मैं, उससे पूछता हूं,

तुम कैसी हो,

मैं ये जानता हूं,

मां अपनी तकलीफ़ से

परेशान है,

लेकिन वो ये

ज़रूर समझती है,

उसका ईश्वर,

जिसकी वो पूजा कर रही है,

मुझे ज़रूर ठीक ही रखेगा।

दरअसल, मां को

अपने से ज़्यादा,

ईश्वर से ज़्यादा,

जिसके सामने वो

रोज़ बैठी मिलती है,

वो मेरी चिंता कर रही होती है।

ये जानते हुए भी,

कि मैं ठीक हूं।

मां, स्वयं भी

ठीक रहती है।

आंखें

ये पलकें, बांध के

सारे किनारे खोल देतीं हैं,

छुपाया कुछ नहीं जाता,

सभी कुछ बोल देतीं हैं।

ये पहरेदारियां

कुछ इस तरह की है,

कोई दिल में उतरता है,

तो बाहें खोल देतीं हैं।

कहां रुक कर,

कोई तुमको पुकारेगा,

चले आना,

जो अबकी शाम ढल जाये,

ये घर को खोल देती हैं।

सड़क पर भीड़ भी होगी,

जरा बचकर निकलना तुम,

यहां कोई नहीं अपना,

ये दिल को तोड़ देतीं हैं।

ये पलकें, बांध के

सारे किनारे खोल देतीं हैं,

छुपाया कुछ नहीं जाता,

सभी कुछ बोल देतीं हैं।

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