बन्दर मस्त कलंदर : The Dainik Tribune

बाल कविता

बन्दर मस्त कलंदर

बन्दर मस्त कलंदर

डॉ़ बी. मदन मोहन

झुंड बनाकर आये बन्दर, काम हैं इनके मस्त कलंदर।

कभी पेड़ पर कूदें-फांदें,ऊधम मचाते घर के अन्दर॥

सुबह-सवेरे ये उठ जाते, घर की छत पर दौड़ लगाते।

दादी मां को सता-सताकर, चना मज़े में खाते बन्दर॥

चुनमुन की क़िताब उठाकर, छीना-झपटी करते बन्दर।

पढ़ना लिखना कुछ नहीं है, मुफ़्त में रौब जमाते बन्दर॥

जब भी प्यास सताती इनको, नलके पर आ जाते बन्दर।

बूंद-बूंद पानी पीते हैं, करतब नये दिखाते बन्दर॥

पेड़ों की डालों पर सोते, झूला उन्हें बनाते बन्दर।

बच्चों को प्यारे लगते हैं, चाहे जो कर जाएं बन्दर॥

पढ़ना-लिखना छोड़ के भैया, शैतानी जो करे निरन्तर।

ऐसा करने वाले बच्चे, तभी तो कहलाते हैं बन्दर॥

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

ओटीटी पर सेनानियों की कहानियां भी

ओटीटी पर सेनानियों की कहानियां भी

रुपहले पर्दे पर तनीषा की दस्तक

रुपहले पर्दे पर तनीषा की दस्तक

पंजाबी फिल्मों ने दी हुनर को रवानगी

पंजाबी फिल्मों ने दी हुनर को रवानगी

आस्था व प्रकृति के वैभव का पर्व

आस्था व प्रकृति के वैभव का पर्व

मुख्य समाचार