पुस्तक समीक्षा

बुनियादी सच्चाइयों का आईना

बुनियादी सच्चाइयों का आईना

सुभाष रस्तोगी

प्रताप सिंह सोढ़ी बहुआयामी प्रतिभा के वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनके अब तक दो कहानी-संग्रह, दो लघुकथा-संग्रह, एक संस्मरण-संग्रह तथा एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यत: वे लघुकथाकार के रूप में जाने जाते हैं। सोढ़ी की लघुकथाएं पंजाबी, उर्दू, मराठी और सिंधी भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी हैं।

‘हौंसले अभी बाकी हैं’ प्रताप सिह सोढ़ी का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है, जिसमें कुल 32 ग़ज़लें व 100 क़तआत संगृहीत हैं। सोढ़ी के इस संग्रह की ग़ज़लें जिंदगी से गुफ्तगू के रूप में सामने आई हैं। ज्यादातर ग़ज़लें और क़तआत जीवन की कटुतम सच्चाइयों का आईना हैं। कुछ ग़ज़लें रवायती भी हैं, लेकिन यह ग़ज़लकार की बुनियादी संवेदना की नुमाइंदगी नहीं करतीं। ग़ज़लकार का मानना है :-

जो समझाता है मुफ़लिसों का दर्द,

आदमी बा शउर होता है।

यह अश्आर भी काबिलेगौर है

जिनकी आंखों में होत बीनाई

उसके फिर दिल में नूर होता है

आज के जीवन की यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो उम्र बच्चों के खिलौने से खेलने की होती है, उस अबोध उम्र में बच्चे के हाथ में पिस्तौल थमा दी जाती है। दूसरे सच्चाई को उजागर करता सोढ़ी का यह अश्अार पाठक की चेतना को गहरे में उद्वेलित करता है :-

बात होती है जब खिलौने की

बच्चा पिस्तौल मांगा करता है

ग़ज़लकार का यह अश्आर सीधे पाठक की चेतना पर हथौड़े-सा बजता है :-

थक के सूरज चल दिया विश्राम पर

अब तो एक जालिम भी है आराम पर

ग़ज़लकार की संवेदना का असल ठिकाना देखना हो तो यह अश्आर देखें :-

बताओ मंदिरों-मस्जिदों में कौन रहता है

बगैर देखे ही दोनों से दोस्ती कर ली

ग़ज़लकार का यह मानना है कि जब से मुफलिसों की फौज बढ़ने लगी है, तब से ही कुबेरों की फौज भी बढ़ने लगी है :-

मुफलिसी समंदर-सी बढ़ने लगी

फौज कुबेरों की ज्यादा हो गई है

सोढ़ी के इस नव्यतम प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘हौंसले अभी बाकी हैं’ में 100 क़तआत भी संगृहीत हैं। यह क़तआत भी ग़ज़लकार की ग़ज़लों की तरह ज्यादातर जीवन की बुनियादी सच्चाइयों को उजागर करते हैं।

उनके सद्य: प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह ‘हौंसले अभी बाकी हैं’ की ग़ज़लें और कतआत की मार्फत जीवन की सच्चाइयों के आरपार सहजता से हम झांक सकते हैं। इन ग़ज़लों में अग्नि में पके हुए बर्तन की-सी ठनक है।  और प्रताप सिंह सोढ़ी इस नव्यतम प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘हौंसले अभी बाकी हैं’ की यही खासियत समकालीन ग़ज़लकारों में उन्हें एक अलग पहचान देती है।

पुस्तक : हौंसले बाकी हैं लेखक : प्रताप सिंह सोढ़ी प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली पृष्ठ : 96 मूल्य : रु. 200.

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

संसदीय लोकतंत्र की गरिमा का प्रश्न

संसदीय लोकतंत्र की गरिमा का प्रश्न