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बीच वाली सड़क

पंजाबी कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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उस दिन से सामनेवाले घर के लोगों का हमारे घर आना बंद और हमारा उनके यहां जाना बंद। कई बार मैं अपने घर के लिविंग रूम में खड़ा होकर देखता कि सामनेवाले घर के लिविंग रूम में तस्वीरें तक हमारे घर से दिखती हैं, पर घरवाले इतने दूर-दूर। मुझे इस तरह खड़ा देख सुरिंदर की मम्मी अपने घर के परदे गिरा देती।

उनका घर हमारे घर के सामने, बीच में एक सड़क। इस पड़ोस में सिर्फ़ दो ही घर ईस्ट इंडियन के। एक सामनेवाला घर, एक हमारा घर। बाकी घर गोरों के। गर्मियों के दिनों में गोरे शाम को घरों से बाहर निकलकर एक जगह इकट्ठे होकर खड़े होते, आपस में बातें करते, हंसते। मैं कई बार उनके बीच जाकर खड़ा हो जाता। वे चुप हो जाते, उनकी बातें ख़त्म हो जातीं, हंसी-ठहाके बंद हो जाते, शायद मेरी भूरी चमड़ी उनके दिमाग़ को सुन्न कर देती हो। मैंने कभी सामनेवाले घर के किसी जन को उनके बीच खड़े नहीं देखा था।

हमारे घर पहली बार मिलने आने वाला लगभग हर नाते-रिश्तेदार यह अवश्य पूछता कि आसपास अपने लोगों का भी कोई घर है? हम तुरंत सामनेवाले घर की ओर इशारा कर देते कि ‘वो घर अपने लोगों का ही है।’ सभी पूछने वालों का लगभग एक ही जवाब होता, ‘यह तो बहुत अच्छा है, अपने लोगों का सुख-दुख में बहुत आसरा होता है।’ लेकिन इन दो घरों के बीच एक सड़क भी है और सड़क पर मानो कांटे उगे हों। वे हमारे घर न आते, हम उनके यहां न जाते। पहले ऐसा नहीं था। मां की सामनेवाले घर की सुरिंदर की मम्मी के साथ बोलचाल थी। कई बार दोपहर के समय, जब दोनों घरों के बाकी लोग कामकाज पर गए होते, वे इकट्ठी एक घर में बैठी स्वेटर-कोटियां बुनती रहतीं। वह मां के पास आ जाती या मां उसके पास चली जाती। सुरिंदर के डैडी के साथ भी ‘हाय-हैलो’ होती रहती। मगर जिस दिन सुरिंदर और मैंने अपने-अपने घर में मेरे और सुरिंदर के विवाह की बात की, हमारे घरों के बीचवाली सड़क पर मानो कांटे उग आए। उन्होंने हमारे घर आना बंद कर दिया, हमने उनके घर जाना।

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सुरिंदर की फ़ैक्टरी और मेरे दफ़्तरवाली बिल्डिंग पास-पास थी। हम दोनों की लंच ब्रेक का टाइम भी एक। कई बार धूप वाले दिन में उसकी फ़ैक्टरी में काम करने वाले लंच टाइम में धूप सेकने बाहर आ जाते। मेरे दफ़्तर वाले भी बाहर निकल जाते। कोई आंखें मूंदकर सूरज की ओर मुंह करके बैठ जाता, कोई धूप में बैठकर अपना लंच किए जाता, साथ ही कोई अख़बार या किताब पढ़ता रहता। पड़ोसी होने के नाते मैं कई बार सुरिंदर के पास जा खड़ा होता या वह मेरे पास आकर खड़ी हो जाती। बातें करते इंडिया की, जहां वह जन्मी-पली, पढ़ाई-लिखाई की और बड़ी हुई। इंडिया, जहां मैं जन्मा, पढ़ा और जवान हुआ। कई बार वह इंडिया में होने वाले फ़िरक़ू फ़सादों को लेकर चिंतित होती, समाज में जात-पात, ऊंच-नीच के बंटवारे के विरुद्ध गिला करती। हमारे विचार आपस में मिलते। दिनोंदिन हमारी सांझ बढ़ती चली गई।

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फिर वह लंच समय में मेरे दफ़्तर आने लगी। हम साथ बैठकर लंच करते। मेरी तरह उसको भी कैनेडा आए अभी चार-पांच साल ही हुए थे। बी.ए. कर रही थी, जब मां-बाप के साथ कैनेडा आ गई। कपड़े सीने का कोर्स करके रजाइयां बनाने वाली इस छोटी-सी फ़ैक्टरी में रजाइयां सिलने का काम करने लगी। घर की अपनी पूरी ज़िम्मेदारी समझती। घर में वह और उसके डैडी ही कमाने वाले थे। उसकी मम्मी घर में बैठकर ही स्वेटर-कोटियां बुन लेती, जिससे बमुश्किल पांच-सात डॉलर की दिहाड़ी ही बनती। वह मां को बाहर कहीं काम करने न जाने देती। कहती, ‘कहां बाहर फ़ार्मों पर धक्के खाती घूमेगी।’ उसका छोटा भाई स्कूल में पढ़ने जाता। इतनी ज़िम्मेदार और सयानी लड़की मेरे अंदर कहीं गहरे अपना स्थान बनाती चली गई। मैं कई बार हंसी-हंसी में कह देता, ‘सुरिंदर, इतनी समझदारी तूने कहां से ली?’

‘तेरे साथ रहकर... वह झट से कह देती। और एक दिन हमने ज़िंदगी भर के लिए एक-दूसरे के साथ की बात की। मां-बाप की सहमति आवश्यक थी साझे परिवार वाले घरों में। सुरिंदर के लिए भी ज़रूरी, मेरे लिए भी ज़रूरी। वह भी अपने मां-बाप की सयानी और ज़िम्मेदार बेटी, मैं भी परिश्रमी और आज्ञाकारी बेटा।

‘इतनी हसरतों से पाला-पोसा इकलौते बेटे को। सोचा था, इसके विवाह पर सभी चाव पूरे करूंगी,’ मां ने आह भरी।

‘अब चाव पूरे कर लो, सुरिंदर में कोई नुक़्स तो बताओ?’ मैं मुंहफट हो गया।

‘जुलाहों की बेटी घर में लाकर चाव पूरे करें? ...देखो तो, इसकी अक्ल को पता नहीं क्या हो गया है? भाईचारे में नाक कटवानी है... ‘लागी’ जात की लड़की, अपनी लड़कियों का अकाल तो नहीं पड़ गया?’ मां ने नाक पर हाथ फेरा।

‘सिद्धू-बराड़ों के घरों में अब जुलाहों की लड़कियां बहू बनेंगी,’ डैडी शायद जवान बेटे के साथ टक्कर नहीं लेना चाहते थे, पर उनके ज़ज्ब किए गुस्से में से व्यंग्य का तीर छूटा।

‘राजे, हरेक काम ज़रूरी तो नहीं होता कि अपने लिए ही किया जाए... हमें इन बड़ों का भी ख़याल करना चाहिए, जिन्होंने हमें पाला-पोसा है। अगर वह तेरी घरवाली होगी, तो ऐसे भी सोच कि मां की बहू भी होगी,’ बहन ने प्यार के साथ समझाने की कोशिश की।

‘सुरिंदर एक समझदार लड़की है। अगर वह ज़िम्मेदार पत्नी होगी, तो ज़िम्मेदार बहू भी होगी। मेरी समझ में यह नहीं आता कि हम जट्ट लोग ऊंचे क्यों हैं और वो जुलाहे निम्न क्यों?’

पर मेरी किसी ने नहीं सुनी। बहनोई ने बहन की तरफ़ घूरती नज़रों से देखते हुए कहा, ‘चल उठ, चलें। बहुत हो गया। यह मानने वाला नहीं।’ उसको गुस्सा इस बात का भी था कि घर आए दामाद का मैं मान नहीं रख रहा था। बहन ने तो दबी-सी ज़ुबान से कह भी दिया, ‘अगर तू मां-बाप का कुछ नहीं लगता, तो हमारा कब लगा।’

दूसरे दिन मिली सुरिंदर भी मोटे-मोटे आंसू रोती रही। उसके मां-बाप ने भी उसकी पूरी लानत-मलामत की थी, ‘नाते-रिश्तेदार तो ताने मारेंगे कि लड़के के साथ पहले ही मिली होगी, जो जट्टों के लड़के के साथ ब्याही है।’

उस दिन से सामनेवाले घर के लोगों का हमारे घर आना बंद और हमारा उनके यहां जाना बंद। कई बार मैं अपने घर के लिविंग रूम में खड़ा होकर देखता कि सामनेवाले घर के लिविंग रूम में तस्वीरें तक हमारे घर से दिखती हैं, पर घरवाले इतने दूर-दूर। मुझे इस तरह खड़ा देख सुरिंदर की मम्मी अपने घर के परदे गिरा देती। उनके घर में लगी गुरु नानक देव जी की तस्वीर परदों के पीछे छिप जाती। ऐसी ही एक तस्वीर हमारे घर में भी लगी हुई थी। मैं सोचता, ‘कमाल है! दोनों घरों में एक जैसी तस्वीरें... वे भी सिख और हम भी सिख। वे भी पंजाबी, हम भी पंजाबी, पर वो जुलाहे और हम जट्ट!’ घरों के बीच वाली सड़क मुझे बहुत परायी लगने लगी।

एक रात कोई शरारत कर गया। शीशे तोड़ गया—उनकी कार के शीशे, हमारे घर के शीशे। सुरिंदर के डैडी और मेरे डैडी दोनों गुस्से में, दोनों ही सहमे-सहमे। दोनों ही सड़क पर आ गए। वे अख़बार को ख़बर करने, पुलिस और नस्ली दंगों के विरुद्ध बने संगठन को सूचित करने की सलाह करने लगे। मेरी मां और सुरिंदर की मम्मी भी एक साथ खड़ी होकर शरारती लोगों को कोसने लगीं।

‘आस-पास के किसी दूसरे घर को कोई नुकसान नहीं किया, हमारे दोनों घरों पर ही यह नीच क़हर ढाया।’

‘मरजाणे, कई गोरे हम लोगों को खाते-पीते देखकर राज़ी नहीं। इनके पेट में दर्द उठता है कि ये लोग यहां आकर बड़े-बड़े घरों में रहते हैं।’

मुझे लगा, जैसे हमारे अंदर के कांटे कुचले गए हों। मेरे और सुरिंदर के लिए राह साफ़ हो गई हो।

काम पर जाने का मेरा समय हो गया था। सुरिंदर को भी काम पर जाना था, पर उसकी कार के शीशे टूटे हुए थे। मैंने सुरिंदर के डैडी के आगे सुरिंदर को राइड देने का प्रस्ताव रखा, पर उनका रूखा जवाब था, ‘नहीं, मैं खुद छोड़ आऊंगा।’

अनुवाद : सुभाष नीरव

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