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मेला अलबेला और सृजन के यक्ष प्रश्न

गुजरात साहित्य अकादमी

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अकादमी ने गुजराती, संस्कृत, हिंदी, कच्छी, सिंधी, और उर्दू में लगभग 500 किताबें अब तक छापी हैं। उसकी वेबसाइट पर जाकर खंगाल लीजिये, आपको सरदार पटेल नहीं मिलेंगे, गुजरात का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं मिलेगा। अकादमी ने 2021 में शब्द सृष्टि दिवाली अंक पत्रिका छापी है, उसके कवर पर एक दर्जन चेहरों के साथ सरदार पटेल नमूदार हैं। लेकिन उन पर अलग से पुस्तक नहीं है।

विश्व पुस्तक मेले में वैभव का प्रदर्शन पीएम मोदी के कट आउट के साथ जगह-जगह दिख रहा था। अधिकांश प्रकाशक हिंदूवादी-राष्ट्रवादी पुस्तकों के साथ नुमायां हैं। भारत मंडपम में सबसे विराट स्वरूप वाला ‘भारतीय सैन्य इतिहास : वीरता और ज्ञान @ 75’ पैवेलियन देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। यह सेना के शौर्य को प्रदर्शित करता एक शानदार थीम पैवेलियन है, जिसमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सैन्य अभियानों को तोप और युद्धक विमान के मॉडल के साथ दर्शाया गया है। इसके आगे सारे स्टाल बौने से लगेंगे। इस पैवेलियन में विमर्श के वास्ते सेना के वरिष्ठ अधिकारी, डिफेन्स एक्सपर्ट भारत के शौर्य का बखान, और बीच-बीच पीएम मोदी की चर्चा करते दिखते हैं।

एक हज़ार से ज्यादा प्रकाशक, और तीन हज़ार से अधिक स्टालों में बहुतेरे प्रकाशकों ने ब्रांड मोदी को इस पुस्तक मेले में बेचा है। मोदी के सेल्फी-प्वाइंट, मोदी के बैनर-पोस्टर-कटआउटों से पटा पड़ा है विश्व पुस्तक मेला। लेकिन, गुजरात साहित्य अकादमी में इतना सन्नाटा क्यों?

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पटेल पर पुस्तक नहीं। पीएम मोदी पर भी एक किताब नहीं। विश्व पुस्तक मेले में गुजरात साहित्य अकादमी के स्टाल पर यह देखकर मैं हैरान हुआ। दो सौ किताबों के साथ लगभग आठ गुना दस फीट का छोटा-सा स्टाल। दो लोग बैठे। एक वैभवशाली प्रदेश की साहित्य अकादमी स्टाल एकदम उपेक्षित-सा।

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इस अकादमी की स्थापना कांग्रेसी मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी के कार्यकाल में 24 सितंबर, 1981 को हुई थी। गुजरात के शिक्षा सचिव समेत इसके 41 सदस्य हैं। वर्ष 2003 से 2015 तक यह संस्था बिना किसी अध्यक्ष के ख़रामा-ख़रामा चलती रही।

वर्ष 2015 एक आईएएस भाग्येश झा को जब गुजरात साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया, उसे लेकर काफी विवाद हुआ। 2017 में पत्रकार विष्णु पांड्या गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बनाये गए। गुजरात साहित्य अकादमी में धन का संकट भी बताया जाता है। बाज़ दफा गुजरात साहित्य अकादमी और गुजरात साहित्य परिषद के बीच वर्चस्व को लेकर जंग छिड़ जाती है। गुजरात साहित्य परिषद् को अपनी विरासत पर नाज़ रहता है, 1936 में महात्मा गांधी इसके अध्यक्ष रह चुके थे।

अकादमी ने गुजराती, संस्कृत, हिंदी, कच्छी, सिंधी, और उर्दू में लगभग 500 किताबें अब तक छापी हैं। उसकी वेबसाइट पर जाकर खंगाल लीजिये, आपको सरदार पटेल नहीं मिलेंगे, गुजरात का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं मिलेगा। अकादमी ने 2021 में शब्द सृष्टि दिवाली अंक पत्रिका छापी है, उसके कवर पर एक दर्जन चेहरों के साथ सरदार पटेल नमूदार हैं। लेकिन उन पर अलग से पुस्तक नहीं है।

अलबत्ता, गुजरात साहित्य अकादमी ने तुलसी, कबीर, गांधी, अम्बेडकर, औरंगज़ेब, श्यामजी कृष्ण वर्मा, सत्यजीत रे, महिला संत भक्तोनी पर पुस्तकें छापी हैं। क्या गुजरात साहित्य अकादमी नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साहित्यिक अवदान से अनभिज्ञ है? पीएम मोदी एक कवि भी हैं। नरेंद्र मोदी की कविताओं पर एक पुस्तक है—‘ए जर्नी : पोयम्स बाय नरेंद्र मोदी।’ इस पुस्तक में भी पीएम मोदी की गुजराती में लिखी गई कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद रवि मंथा ने किया है। इस पुस्तक की भूमिका खुद मोदी ने लिखी है। रूपा पब्लिकेशन से प्रकाशित इस पुस्तक संग्रह में नरेंद्र मोदी द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखी गई 67 कविताएं हैं।

पीएम मोदी की एक और पुस्तक है, ‘लैटर्स टू मदर’। मां को लिखे गए ख़त गुजराती में हैं, और इनका अंग्रेजी में अनुवाद किया है भावना सुमाया ने। इस पुस्तक में बताया गया है कि नरेंद्र मोदी जब युवा थे, तो उनको हर रात सोने से पहले देवी मां को डायरी में एक पत्र लिखने की आदत हो गई थी। इस पत्र में वे मां को ‘जगत जननी’ के रूप में संबोधित करते थे। इन पत्रों के विषय अलग-अलग हुआ करते थे। उभरे हुए दुख थे, क्षणभंगुर खुशियां, स्मृतियां आदि। मोदी के लेखन में एक नौजवान का उत्साह और बदलाव लाने का जुनून था। बताते हैं, नरेंद्र मोदी कुछ महीनों बाद डायरी के पन्ने फाड़कर जला देते थे। हालांकि, 1986 की एक डायरी के कुछ पन्ने बच गए। और बचे हुए ये पत्र अब अंग्रेजी में “लेटर्स टू मदर” के रूप में उपलब्ध हैं।

पीएम मोदी ने अपने पहली किताब ‘आपातकाल में गुजरात’ उस जमाने में लिखी थी, जब वह युवा थे और गुजरात में आपातकाल के खिलाफ भूमिगत संघर्ष कर रहे थे। पांचजन्य का दावा है कि पीएम मोदी ने अभी तक के प्रधानमंत्रियों में सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ने जहां 11 किताबें लिखी थीं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किताबों की संख्या 23 (इसमें अन्य भाषाओं में अनुवाद भी शामिल) है। अकादमियां अक्सर साहित्य, कला, इतिहास या सांस्कृतिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करती हैं, न कि समकालीन नेताओं की जीवनी पर, जब तक कि उनके साहित्यिक या ऐतिहासिक योगदान बड़े न हों। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी ने साहित्य में जो कुछ रचनात्मक योगदान दिया, उस पर एक किताब तो गुजरात साहित्य अकादमी की ओर से छपनी बनती है।

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