पुस्तक समीक्षा

कविता में खूब सारी बातों की खनक

कविता में खूब सारी बातों की खनक

ज्योत्सना कलकल

‘बतियाती औरतें’ कवि मनोज तिवारी का दूसरा काव्य संग्रह है, जिसमें एक आम लेकिन संवेदनशील व्यक्ति के मन में हिलोरें लेने वाले जज्बात और अनुभव सरल तथा सहज ढंग से पिरोए गए हैं। इन कविताओं में जीवन के बहुत से रंग हैं और ये आत्मीय होने के साथ-साथ देश, गांव, पिता, आंगन और दैनिक जीवन के अनेक कठिन पलों को सामने रखती हुई आम बातचीत भरे मुक्त अंदाज़ में पेश करती हैं।

कवि का हृदय रह-रह कर कविता के माध्यम से अपने बचपन में झांकने की कोशिश करता है। ‘पैदाइश गांव की/ शहर में अनफिट पड़ा हूं/ गांव देहात में ही नाभिनाल गड़ा है मेरा और यात्रा शेष है अभी मेरी’ जैसी पंक्तियां ख़ास तौर से उल्लेखनीय हैं।

क्या आज सिर्फ अश्वत्थामा ही शापित है? और ‘युद्ध रुक सकता था’ में क्या तुम खुश थे/ वासुदेव! एक निर्लज्ज समय के/ साक्षी बन गए/ महाभारत की सार्थकता पर/ एक बारगी संशय तो हुआ होगा न, बड़ी गंभीरता से पूछे गए प्रश्न कवि के साहसी और गहन चिंतन वाले रूप का प्रमाण हैं। 

कवि सरलता का बड़े कलात्मक ढंग से प्रयोग करते हैं जो अच्छे-खासे चित्र प्रस्तुत करते हुए पाठक को अपनी क्रियाशीलता का हिस्सा बना लेता है। शीर्षक कविता ‘बतियाती औरतें’ बड़ा प्यारा संदेश देती है दुनिया की तमाम औरतों को/ हंसना चाहिए। मां तुम सिर्फ शब्द नहीं संघर्षों की गाथा हो और गौरैया से बातें करते हुए पूछना कहीं तुम्हें/ मां ने तो/ नहीं भेजा है! आओ पास आओ! ‘पिता बनकर’ कविता में हाड़ तोड़ मेहनत के बाद/ सपनों में/ सपने बोना अच्छी तरह आता था उन्हें, जैसे शब्द मन को कहीं गहरे जाकर छू लेते हैं।

इन कविताओं में हर रोज़ की भागदौड़ और विचारों को बिना किसी भारी-भरकम भाषा और आवरण के रखा गया है। अलग-अलग घटनाओं और जगहों का ज़िक्र करते हुए उन्हें परत-दर-परत इस तरह खोल कर रख दिया है कि पाठक एक बार तो खुद को उस सबके बीच ही खड़ा पाता है और इन बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की भावना जागृत होने लगती है। पर इससे हटकर कवि अंधकार में उम्मीद का दीया रोशन करने की बात रखना भी नहीं भूलता। दंगा कथा वाया दिल्ली और अन्य कविताओं में अलीगढ़, कश्मीर, मथुरा तो कहीं भागलपुर जैसी जगहों का ज़िक्र उल्लेखनीय है।

आधुनिक समय के हिसाब से अलग-अलग समस्याओं, सत्ता के खेल, बढ़ती संवेदनहीनता को उजागर करने के लिए कविताओं में खुल कर रोज़मर्रा के शब्दों का यूं का यूं इस्तेमाल हुआ है। कविता लिखना/ संघर्ष के लिए तैयार करना है खुद को और जब लिखना बहुत ज़रूरी हो जाएगा तो प्रेम लिखूंगा/ कार्तिक मास में/ गंगा नहा कर/ लिखती थी जैसे मां/ तुलसी दल पर राम, मन को सुकून देने वाली पंक्तियां हैं। मनोज तिवारी का यह कविता संग्रह अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए है।

पुस्तक : बतियाती औरतें कवि : मनोज तिवारी प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,  जयपुर पृष्ठ : 88 मूल्य : रु. 120.

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