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एकाकीपन

कहानी

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चित्रांकन संदीप जोशी
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‘यूरो’ की आंखें नम हो जाती हैं। उसकी आंखों से अश्रु-धारा बह निकलती है। प्रत्युत्तर में वह केवल कूं-कूं ही कर पाता है और अपना चेहरा नीचे झुका लेता है। शायद उसके मन में यह द्वंद्व अवश्य चल रहा होगा कि क्यों मां को सब लोगों ने अकेला छोड़ दिया और वह किस तरह मां की सहायता कर सकता है। और कैसे जीवन की इस संध्या में वह उसकी बैसाखी बन उसके एकाकीपन को दूर कर सकता है।

कृष्णकान्त जी ने भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होकर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ‘एचएमटी. लिमिटेड’ में एक विशेष तकनीकी विशेषज्ञ की हैसियत से नौकरी हासिल की। दुर्भाग्यवश ‘एचएमटी लिमिटेड’ भारी घाटा होने के कारण बंद हो गई। इस कारण कृष्णकान्त जी पीछे अपना परिवार छोड़कर अमेरिका में बसे अपने बेटे के पास चले गए। उनके परिवार में उनकी पत्नी विमला देवी, 30 वर्षीय उनकी बेटी रितु और लैब्राडोर कुत्ता ‘यूरो’ ही बचा। यद्यपि उनकी बेटी रितु पढ़ी-लिखी थी, पर उसके पास कोई स्थाई नौकरी न थी। वह एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में सुपरवाइजर का काम देखती थी और उसे कमीशन के आधार पर कुछ आमदनी हो जाती थी। वह अपनी इस स्थिति से बिल्कुल भी खुश न थी। रितु की मां विमला देवी बहुत पढ़ी-लिखी महिला न थी, पर गृहकार्य में पर्याप्त कुशल थी। उनका सारा समय घर के कामकाज और ‘यूरो’ की देखभाल में ही बीत जाता था।

कृष्णकान्त जी को अमेरिका गए 15 वर्ष हो गए थे और एक बार भी वह अपने घर वापस नहीं आए। उन्हें अमेरिका में ग्रीन कार्ड मिल गया था। अब वह पूरी तरह अमेरिका के प्रामाणिक नागरिक हो गए थे और वहां की संस्कृति में पूरी तरह घुलमिल गए थे। अमेरिका की चकाचौंध ज़िंदगी में पारिवारिक मूल्यों की अहमियत से दूर पाश्चात्य सभ्यता में ‘जैसा देश, वैसा भेष’ के संस्कारों को उन्होंने पूरी तरह आत्मसात‍् कर लिया था। अपनी पत्नी व बेटी को वह लगभग भूल चुके थे। बेटी रितु भी उम्रदार हो गई थी। 45 के लगभग उसकी उम्र थी। महत्वाकांक्षी होने के कारण उसे विवाह के बंधनों में कोई रुचि न थी। स्वच्छंद जीवन व्यतीत करने की वह आदी हो चुकी थी। वह कब घर आती, कब घर से जाती, किसके साथ उठती-बैठती, क्या काम करती, उसकी आमदनी का जरिया क्या होता, किसी को कुछ नहीं मालूम था। अच्छा खाना-पीना, महंगे कपड़े पहनना, फैशन करना, उसके शौक थे। पैसे की उसे कोई कमी न थी। ब्यूटी पार्लर वह लगभग रोज़ जाया करती थी।

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विमला देवी की उम्र भी 70 के पार हो गई थी। वह अधिकतर बीमार ही रहती थी। रितु से उसको कुछ आशा अवश्य थी, पर सच यह था कि रितु उसके पास रहकर भी अपने पिता की ही तरह मां से सदा दूर ही रहती थी। एक दिन सोसायटी में पता चला कि रितु अपनी ब्यूटी पार्लर वाले किसी जर्मन दोस्त के साथ जर्मनी चली गई। अकस्मात उसके जर्मनी जाने के निर्णय से विमला देवी को बहुत धक्का लगा। उसे तो समझ ही नहीं आया कि उसके साथ क्या हो रहा है। विमला देवी अपने ‘यूरो’ के साथ ही अकेले घर में रहने लगी। विक्षिप्त-सी होकर वह कभी सोसायटी के चौकीदार से बात करती, तो कभी माली से, कभी जमादार से, तो कभी धोबी से या कभी आते-जाते मजदूरों से। सभी लोग विमला देवी से बात करने से कतराते। सोसायटी की औरतों ने तो उसे पूरी तरह पागल ही घोषित कर दिया था। कोई भी विमला देवी से बात करना तो दूर उसके पास खड़े होने से भी परहेज करता था। विमला देवी की मानसिक अवस्था इस उपेक्षा और जीवन में लेन-देन के महत्व का आंकलन करने में सक्षम न थी। विमला देवी जब भी घर से बाहर निकलती ‘यूरो’ उसकी परछाई की तरह साथ होता। अक्सर ऐसा देखने में आता कि सोसायटी के लॉन में विमला देवी एक बेंच पर बैठी होती और ‘यूरो’ ठीक उनके सामने बैठा बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनता और आते-जाते लोग इस दृश्य को देखकर मुस्कराते हुए कानाफूसी करते और आपस में न जाने क्या-क्या बातें बनाते। इन सब बातों से अनभिज्ञ विमला देवी बड़ी तन्मयता से ‘यूरो’ से बातें करतीं। अपनी व्यथा बताती, एकाकीपन साझा करती और ‘यूरो’ से बीच-बीच में उसका भी हालचाल पूछती जाती। ‘यूरो’ भी कभी-कभार अपने पैर से अपने मुंह पर हल्के से वार करता, बाहर जीभ निकालकर अपनी नाक व होंठ पोंछता और हल्की-सी गर्दन झुका कर कूं-कूं कर किसी-किसी बात पर हामी भरता। बिना किसी हलचल के दोनों एक-दूसरे से अपने-अपने अंदाज़ में बात करते। ‘यूरो’ अब बहुत गंभीर हो गया था। भौंकना लगभग उसने छोड़ दिया था या उम्र के जिस पड़ाव में वह था भौंकना अब उसके बस की बात न थी।

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रितु को जर्मनी गए 6 महीने से ज्यादा हो गए थे। और उसने कभी भी मां की कोई खबर न ली। मां को शायद इसी परिणाम की आशा थी, या विक्षिप्त मन इन सब रिश्तों की अहमियत को समझ पाने में असमर्थ था। या एकाकीपन ने विमला देवी को इतना उदासीन बना दिया था कि उसे स्वार्थयुक्त संबंधों एवं नि:स्वार्थ संबंधों में अंतर समझ नहीं आता था। अब उसका मन कल्पना के अनंत आकाश में उड़ान भरता था। उसे सौ-सौ घोड़े द्वारा खींचे जा रहे रथ में भगवान सूर्य के दर्शन होते, तो कभी जलपरी उसका रास्ता रोके खड़ी होती, तो कभी रास्ते में सैकड़ों काले सांपों का झुंड उड़ता नज़र आता। कभी धरती, पेड़, आकाश घूमते नज़र आते। भूकंप के नाम से वह सिहर उठती और सड़क पर वर्षा की फुहार का अहसास करती हुई बदहवास भागती। ‘यूरो’ उसकी परछाई की तरह उसके पीछे-पीछे साथ लगा रहता। किसी भी पूजा-पाठ, मंदिर की घंटी, शंख की ध्वनि उसके कानों में पड़ती तो वह अपने बाल बिखेर कर, गोल-गोल सिर घुमाते हुए ज़ोर-ज़ोर से चीख-चीख कर एक ही जगह पर चक्कर काटती। कोई भी उसकी इस हालत पर तरस नहीं खाता। बस ‘यूरो’ ही उसके दुपट्टे का कोना पकड़ने का प्रयास करता और दुपट्टा मुंह में आने पर उसे ज़ोर से खींचता। बीच में कभी-कभी अपनी पूरी क्षीण शक्ति से भौंकने का प्रयास भी करता मानो कह रहा हो- मां...मां... अब बस करो... घर चलो!

विमला देवी जिस किसी से भी मिलती तो अपने परिवार की बातें कभी नहीं करती, बस ‘यूरो’ के ही किस्से सुनाती। ‘यूरो’ ही उसका सबसे हितैषी सगा-संबंधी था। ‘यूरो’ को वह अपने बेटे की तरह प्यार करती थी। ‘यूरो’ ही उसकी संपूर्ण दुनिया थी। ‘यूरो’ के जन्मदिन को विमला देवी खूब जोश-खरोश के साथ मनाती। सुबह-सुबह ‘यूरो’ को साबुन से रगड़-रगड़ कर नहलाती। उसका बदन साफ करती और शाम को सोसायटी के बच्चों को उसके जन्मदिवस की पार्टी में बुलाती। शाम को ‘यूरो’ के सिर पर फैंसी टोपी पहना कर उसके साथ सेल्फी लेती। उससे प्यार से, दुलार से बात करती। ‘यूरो’ भी एक सुसंस्कृत, अनुशासित, आज्ञाकारी बेटे की तरह चुपचाप मां को सब कुछ करने देता। देर शाम तक विमला देवी आगंतुकों की प्रतीक्षा करती, पर दरवाज़े पर कोई दस्तक न होती और न ही घंटी बजती। विमला देवी केक काटती और अपने हाथ से ‘यूरो’ को खिलाती और ‘यूरो’ अपनी नम आंखों से मां के चरणों में लोट जाता। मां और बेटे के इस दुलार, स्नेह और प्यार का एकमात्र साक्षी होते घर के मंदिर में विराजे, मुस्कराते बाल गोपाल।

विमला देवी आज बहुत खुश थी और ‘यूरो’ भी एक आज्ञाकारी बेटे की तरह बस मां की ही बातें सुन रहा था। विमला देवी उससे कहती- ‘यूरो’ तुम बिल्कुल मत घबराना। मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली। बस तुम मेरा एक कहा मान लो- ठीक से खाना खाना शुरू कर दो। देखो, कितने कमजोर हो गए हो। पतला-सा चेहरा निकल आया है। और वह दोनों हाथों से ‘यूरो’ का चेहरा पकड़कर उसके माथे को चूम लेती है। ‘यूरो’ की आंखें नम हो जाती हैं। उसकी आंखों से अश्रु-धारा बह निकलती है। प्रत्युत्तर में वह केवल कूं-कूं ही कर पाता है और अपना चेहरा नीचे झुका लेता है। शायद उसके मन में यह द्वंद्व अवश्य चल रहा होगा कि क्यों मां को सब लोगों ने अकेला छोड़ दिया और वह किस तरह मां की सहायता कर सकता है। और कैसे जीवन की इस संध्या में वह उसकी बैसाखी बन उसके एकाकीपन को दूर कर सकता है। जबकि वह स्वयं भी बीमार रहता है, उसकी दोनों किडनी फेल हो चुकी है। उसने अपनी बीमारी मां से छुपा रखी है। मां ‘यूरो’ के खाना छोड़ देने से बेहद व्यथित है। ‘यूरो’ से बात करते हुए विमला देवी अधिक विवेकशील और समझदार प्रतीत होती है। यूरो से कहती है- कभी भी अपने को लावारिस मत समझना। मैं तुम्हें छोड़कर कभी भी, कहीं भी नहीं जाऊंगी। बस तुम मुझे एक बार बता दो कि खाने में तुम्हें क्या पसंद है। मैं तुम्हें बना कर दूंगी। देखो... आज सुबह तुमने दूध रोटी की ओर देखा तक नहीं। दोपहर में भी कुछ नहीं खाया। बिना खाए-पीए कैसे काम चलेगा? मैं तुम्हें अंडे उबाल कर देती हूं। वह तुम्हें बहुत पसंद है। ‘यूरो’ एकटक बस मां की ओर ऐसे निहारता रहा मानो उसकी लाचारी को समझ रहा हो, पर कुछ न कर पाने की स्थिति में वह अपने दोनों पैर आगे फैला के, पूरे बदन को ज़मीन से लगाकर, अपना मुंह ज़मीन पर टिकाते हुए, एक-दो बार पलकें झुकाता है और आंसुओं की बड़ी-बड़ी बूंदें ज़मीन को गीला कर देती हैं।

‘यूरो’ के खाना न खाने की वजह से विमला देवी को रात भर नींद नहीं आई। उसने भी ठीक से खाना नहीं खाया। सुबह-सुबह चार बजे विमला देवी का ब्लड शुगर और रक्तचाप दोनों ही अपने निचले स्तर से भी काफी नीचे चला गया। विमला देवी पसीने-पसीने हो गई। घबराहट में वह झटके से पलंग से उठी और जोर का चक्कर खाकर ज़मीन पर गिर पड़ी और फिर कभी उठ नहीं पाई। स्वर्ग सिधारे उसे 2 दिन हो गए थे। बंद घर में विमला यूं ही पड़ी रही। किसी ने भी विमला देवी की सुध न ली।

‘यूरो’ बंद दरवाज़े के पास आता और पूरी ताकत से भौंकने का प्रयास करता पर उसके मुंह से आवाज़ न निकलती। तीसरे दिन जब घर से दुर्गंध आने लगी तो सोसायटी वालों ने पुलिस को खबर की। पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ा। विमला देवी के अंतिम संस्कार में उसका कोई सगा-संबंधी न आया। एक स्वयंसेवी संस्था ने अंतिम संस्कार का जिम्मा लिया। अंतिम संस्कार में पूरे रास्ते ‘यूरो’ अर्थी के साथ-साथ चलता रहा। यद्यपि उससे चला नहीं जा रहा था, पर वह बिना बोले नम आंखों से अपनी मां की अंतिम विदाई यात्रा में शामिल था। पास के श्मशान घाट में एक पेड़ के नीचे ‘यूरो’ बिना हिले-डुले ज़मीन पर अधमरा-सा पड़ा था। मां की जलती देह देखता लेटा था। कपाल क्रिया के बाद संस्कार में आए सारे लोग घर वापस आ गए। किसी का भी ध्यान ‘यूरो’ की ओर न गया। अंतिम धुएं तक यूरो श्मशान भूमि में यूं ही मां की याद में अविचलित पड़ा रहा। घर वापसी का उसके पास कोई प्रयोजन न था। एकाकीपन में जीना उसके लिए भी बोझिल था। मां से पुनर्मिलन की लालसा से वह भी बैकुंठ धाम की ओर अग्रसर हो गया। पूर्णमासी के चांद ने दुखी मन से काले बादलों के पीछे अपना मुंह छिपा लिया।

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