सूचना एवं संयम

लोकमंगल है मीडिया का धर्म

लोकमंगल है मीडिया का धर्म

संजय द्विवेदी

शानदार जनधर्मी अतीत और उसके पारंपरिक मूल्यों ने मीडिया को समाज में जो आदर दिलाया है, वह विलक्षण है। हिंदी पत्रकारिता की नीव में ही संस्कारों का पाठ है और गहरा मूल्यबोध उसकी चेतना में रचा-बसा है। 30 मई, 1826 को कोलकाता से जब पं. युगल किशोर शुक्ल ने उदंत मार्तण्ड का प्रकाशन प्रारंभ किया था तो उन्होंने उसका उद्देश्य बताया था ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’ यही मंत्र हिंदी और भारतीय पत्रकारिता का मूल मंत्र है। भारतीय मीडिया अपने पारंपरिक अधिष्ठान से ही राष्ट्रभक्ति, जनसेवा और लोकमंगल के मूल्यों से अनुप्राणित होती रही है। वर्तमान में पत्रकारिता पर सवालिया निशान बहुत हैं। ‘एजेंडा आधारित पत्रकारिता’ के चलते समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी कसौटी पर है। सही मायने में पत्रकारिता में अब ‘गैरपत्रकारीय शक्तियां’ ज्यादा प्रभावी होती हुई दिखती हैं। जो कहने को तो मीडिया में उपस्थित हैं, किंतु मीडिया की नैतिक शक्ति और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करना उनका स्वभाव बन गया है। इस कठिन समय में टीवी मीडिया के शोर और कोलाहल ने जहां उसे ‘न्यूज चैनल’ के बजाय ‘व्यूज चैनल’ बना दिया है वहीं सोशल मीडिया में आ रही अधकचरी और तथ्यहीन सूचनाओं की बाढ़ ने नये तरह के संकट खड़े कर दिए हैं।

पत्रकार और एक्टिविस्ट का बहुत दूर का फासला है। किंतु हम देख रहे हैं कि हमारे बीच पत्रकार अब सूचना देने वाले कम, एक्टिविस्ट की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहे हैं। एक्टिविस्ट के मायने साफ हैं, वह किसी उद्देश्य या मिशन से अपने विचार के साथ आंदोलनकारी भूमिका में खड़ा होता है। किंतु एक पत्रकार के लिए यह आजादी नहीं है कि वह सूचना देने की शक्ति का अतिक्रमण करे और उसके पक्ष में वातावरण भी बनाए। हर व्यक्ति का अपना राजनीतिक चिंतन है, जिसके आधार पर वह दुनिया की बेहतरी के सपने देखता है। यहां हमारे समय के महान संपादक स्व. प्रभाष जोशी हमें रास्ता दिखाते हैं। वे कहते थे ‘पत्रकार की पोलिटिकल लाइन तो हो, किंतु उसकी पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए।’

एजेंडा के आधार पर चलने वाली पत्रकारिता के बजाय सत्य पर आधारित पत्रकारिता समय की मांग है। पत्रकारिता का एक ऐसा मॉडल सामने आना चाहिए जहां सत्य अपने वास्तविक स्वरूप में स्थान पा सके। मूल्य आधारित पत्रकारिता या मूल्यानुगत पत्रकारिता ही किसी भी समाज का लक्ष्य है। पत्रकारिता का एक ऐसा मॉडल भी प्रतीक्षित है, जहां सूचनाओं के लिए समाज स्वयं खर्च वहन करे।

मीडिया में प्रकट पक्षधरता का ऐसा चलन उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। हमारे संपादकों, मीडिया समूहों के मालिकों और शेष पत्रकारों को इस पर विचार करना होगा कि वे मीडिया के पवित्र मंच का इस्तेमाल भावनाओं को भड़काने, राजनीतिक दुरभि संधियों, एजेंडा सेटिंग अथवा ‘नैरेटिव’ बनाने के लिए न होने दें। हम विचार करें तो पाएंगे कि बहुत कम प्रतिशत पत्रकार इस रोग से ग्रस्त हैं। किंतु इतने लोग ही समूची मीडिया को पक्षधर मीडिया बनाने और लांछित करने के लिए काफी हैं। हम जानते हैं कि औसत पत्रकार अपनी सेवाओं को बहुत ईमानदारी से कर रहा है। पूरी नैतिकता के साथ, सत्य के साथ खड़े होकर अपनी खबरों से मीडिया को समृद्ध कर रहा है। मीडिया ने हर स्तर पर नागरिकों को जागरूक किया है तो राजनेता और नौकरशाहों को चौकन्ना भी किया है। इसी कारण समाज आज भी मीडिया की ओर बहुत उम्मीदों से देखता है। हमें यह मानना होगा कि मीडिया का काम सत्यान्वेषण है, नरेटिव सेट करना, एजेंडा तय करना उसका काम नहीं है।

सूचना प्रौद्योगिकी ने पत्रकारिता के पूरे स्वरूप को बदल दिया है। अब सूचनाएं सिर्फ संवाददाताओं की चीज नहीं रहीं। विचार अब संपादकों के बंधक नहीं रहे। सूचनाएं अब उड़ रही हैं इंटरनेट के पंखों पर। सोशल मीडिया और वेब मीडिया ने हर व्यक्ति को पत्रकार तो नहीं पर संचारक या कम्युनिकेटर तो बना ही दिया है। वह फोटोग्राफर भी है। उसके पास विचारों, सूचनाओं और चित्रों की जैसी भी पूंजी है, वह उसे शेयर कर रहा है। इस होड़ में संपादन के मायने बेमानी हैं, तथ्यों की पड़ताल बेमतलब है, जिम्मेदारी का भाव तो कहीं है ही नहीं। साइबर के माध्यम से आर्थिक अपराध तो बढ़े ही हैं, सूचना और संवाद की दुनिया में भी कम अपराध नहीं हो रहे। संवाद और सूचना से लोंगो को भ्रमित करना, उन्हें भड़काना आसान हुआ है। कंटेट को सृजित करने वाले प्रशिक्षित लोग नहीं हैं, इसलिए दुर्घटना स्वाभाविक है। ऐसे में तथ्यहीन, अप्रामाणिक, आधारहीन सामग्री की भरमार है, जिसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। फेक न्यूज का पूरा उद्योग यहां पल रहा है। ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ जैसे शब्द बताते हैं कि सूचनाएं किस स्तर पर संदिग्ध हो गयी हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में सच कहीं सहमा सा खड़ा है।

आज बड़े से बड़े मीडिया हाउस से ताकतवर फेसबुक और यू-ट्यूब हैं, जो कोई कंटेट निर्माण नहीं करते। आपकी खबरों, आपके फोटो और आपकी सांस्कृतिक, कलात्मक अभिरुचियों को प्लेटफार्म प्रदान कर ये सर्वाधिक पैसे कमा रहे हैं। गूगल, फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर जैसे संगठन आज किसी भी मीडिया हाउस के लिए चुनौती की तरह हैं। बिना कोई कंटेट क्रियेट किए भी ये प्लेटफार्म आपकी सूचनाओं और आपके कंटेट के दम पर बाजार में छाए हुए हैं और बड़ी कमाई कर रहे हैं। यह एक अद‍्भुत समय है। जब भरोसा, प्रामाणिकता, विश्वसनीयता जैसे शब्द बेमानी लगने लगे हैं। माध्यम बड़ा हो गया है, विचार और सूचनाएं उसके सामने सहमी हुई हैं। सूचनाओं को इतना बेबस कभी नहीं देखा गया, सूचना तो शक्ति थी। किंतु सूचना के साथ हो रहे प्रयोगों और मिलावट ने सूचनाओं की पवित्रता पर भी ग्रहण लगा दिए हैं।

एजेंडा के आधार पर चलने वाली पत्रकारिता के बजाय सत्य पर आधारित पत्रकारिता समय की मांग है। पत्रकारिता का एक ऐसा मॉडल सामने आना चाहिए जहां सत्य अपने वास्तविक स्वरूप में स्थान पा सके। मूल्य आधारित पत्रकारिता या मूल्यानुगत पत्रकारिता ही किसी भी समाज का लक्ष्य है। पत्रकारिता का एक ऐसा मॉडल भी प्रतीक्षित है, जहां सूचनाओं के लिए समाज स्वयं खर्च वहन करे। समाज पर आधारित होने से मीडिया ज्यादा स्वतंत्र और ज्यादा लोकतांत्रिक हो सकेगा। इन सवालों पर सोचना, इनके ठोस और वाजिब हल निकालना पत्रकारिता से प्यार करने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।

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