‘...तभी तो मैं कह रहा हूं कि अब दोबारा बात करके देखो उनके साथ। तुम्हें तो पता है, अब मेरा भाई जसदीप तो रहा नहीं। अब तो मेरी ज़मीन दुगुनी हो गई है। पहले जो मेरे हिस्से पांच किल्ले आते थे, अब दस किल्ले हो गए हैं।’ ‘हैं! क्या कहा!’ हैरानी में आदमी के मुंह से निकला। उसके चेहरे के हाव-भाव दिखाई नहीं दे रहे थे, क्योंकि अब अंधेरा और गहरा हो गया था।
शाम का धुंधलका और गांव की एक अंधेरी गली। मोड़ पर बैठे दो लोग आपस में बातें कर रहे हैं। एक अधेड़ उम्र का आदमी है और दूसरा एक नौजवान लड़का। आदमी ने कंबल लपेटा हुआ है। लड़के ने हुड वाली जैकेट पहनी रखी है। दोनों के चेहरे साफ़ दिखाई नहीं दे रहे हैं।
‘बहुत बुरा हुआ! कैसी अनहोनी हो गई! यह तो क़हर की मौत थी! उन्नीस साल भी कोई उम्र होती है इस दुनिया से जाने की! अभी तो उस पर जवानी आनी थी! अभी तो ढंग से जवानी का मुंह भी नहीं देखा था उसने!’ यह कहकर आदमी एक ठंडी आह भरते हुए शोक में डूब गया।
‘जो रब की मर्ज़ी… उसके आगे भला किसका ज़ोर चला है!’ लड़का बोला।
‘मैं तो तुम्हारे घर भी नहीं आ सका, खुद ही बीमार पड़ गया था। डेढ़-दो महीने बिस्तर पर पड़ा रहा। डॉक्टर कहता था - टाइफाइड बिगड़ गया। अब जाकर थोड़ा ठीक हुआ हूं। बड़ी मुश्किल से भोग पर गुरद्वारे जा पाया था, पर भीड़ भी कितनी थी उस दिन। होनी ही थी भाई, अनहोनी जो ऐसी हो गई थी। मुझे अफ़सोस है कि उस दिन न तो तुमसे मिल सका, न तुम्हारे बापू से बात कर सका। न ही अफ़सोस कर सका।’ आदमी ने पछतावा प्रकट करते हुए पूछ ही लिया, ‘एक्सीडेंट क्या नहर के पास हुआ था?’
‘हां ताया जी। नहर के उस तरफ़, पुल के नज़दीक। मोटरसाइकिल पर आ रहा था जसदीप। उधर आढ़ती के पास एक काम था, वह कालेज से सीधा उधर ही चला गया। बाज़ार से भी थोड़ा सौदा खरीदना था। आजकल सर्दियों में यूं भी दिन छोटे होते हैं। घर लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। उधर नहर के पास एक ट्रैक्टर-ट्रॉली खड़ी थी। जिसके पीछे कोई बत्ती भी नहीं लगी थी। दूर से शायद ट्रॉली दिखी नहीं होगी। मोटरसाइकिल स्पीड पर होगी, पास आने पर ही पता चला होगा और ब्रेक नहीं लग पाए होंगे। ट्रॉली से टकराकर वह वहीं सड़क पर इस तरह गिरा कि उसका सिर सड़क से जा टकराया! वहीं बेहोश हो गया। पैर भी टूटा, बांह पर भी चोट लगी। ट्रॉली वालों ने ही उसे उठाया और वहां से गुजरती किसी कार को रोका। कार में डालकर वे उसको अस्पताल ले गए। मगर वह तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही पूरा हो गया।’ भारी शोक में लड़के का गला भर आया और आवाज़ भारी हो गई।
‘पर कब पता चला तुम लोगों को?’
लड़के ने आगे बताना शुरू किया, ‘यह लड़का कौन है? वे सोच ही रहे थे कि उनके हाथ उसका मोबाइल लग गया जो टूटने से बच गया था। मोबाइल से कोई नंबर निकालकर किसी को फोन करके उन्होंने पता लगाना चाहा कि यह किसका फोन है? लेकिन फोन लॉक था। बहुत माथापच्ची की, पर लॉक खुला नहीं। तभी फोन बज उठा। यह फोन मम्मी ने किया था कि पता करे कि जसदीप को इतनी देर कैसे हो गई? वह अभी तक घर क्यों नहीं आया? पर फोन जसदीप की जगह किसी ओर ने उठाया। किसी अनजान-सी आवाज़ सुनकर मम्मी को लगा कि शायद कोई गलत नंबर मिल गया है। ट्रॉली वालों ने जब पूछ लिया कि यह नंबर किसका है तो मम्मी ने बताया कि यह तो मेरे बेटे जसदीप का नंबर है। आप कौन हो? उन्होंने जसदीप के एक्सीडेंट के बारे में बता दिया और साथ ही, बताया कि वे उसको लेकर अस्पताल जा रहे हैं।’
‘फिर?’ ताया ने लड़के से अधीर होकर पूछा।
‘मम्मी को तो सुनकर गश पड़ने लगे। मैंने फोन लेकर उनसे सारी बात पूछी। वे अस्पताल के करीब पहुंच गए थे। मैं और बापू पड़ोस से मोटरसाइकिल लेकर तुरंत अस्पताल पहुंचे। घर के अन्य लोग भी आ गए। लेकिन हमारे पहुंचने तक तो सब खत्म हो चुका था।’ लड़के ने एक लंबी ठंडी आह भरी और चुप हो गया।
कुछ पल दोनों के बीच एक चुप पसरी रही।
आदमी ने ही इस चुप को तोड़ा, ‘सिर में लगी चोट बड़ी खतरनाक होती है! हाथ-पैर टूट जाए तो ठीक हो जाते हैं। और फिर जब इंसान की आई हो, तो उसे कौन रोक सकता है, ईश्वर तो एक बहाना बनाता है।’
‘हां जी, समझ लो, बहाना ही बना। घर से तो अच्छा-भला गया था, हंसता-खेलता।’
‘इंसान का कुछ पता नहीं होता भाई। अगले ही पल क्या हो जाना है, कोई नहीं जानता! मुझसे तो वह कोई तीन महीने पहले, खुद मोटरसाइकिल पर जाते हुए मिला था। मज़बूत कद-काठी का था, सुंदर जवान गबरू…।’
‘हां जी, पूरा छह फुटा था, बास्केटबॉल का खिलाड़ी। कॉलेज की टीम में खेला करता था। पिछले दिनों ही इंटर-यूनिवर्सिटी खेलकर आया था। किसी के साथ कोई फालतू बात नहीं करता था, न ऊंची, न नीची। किसी गलत संगत में उसका उठना-बैठना नहीं था। बड़ा समझदार और सयाना लड़का था।’
‘हां, तभी कहा करते हैं न कि अच्छे लोगों की रब को भी ज़रूरत होती है। तुमसे उम्र में कितना छोटा था वो?’ आदमी ने पूछा।
‘करीब तीन साल ही छोटा था मुझसे।’ लड़के ने बताया।
‘फिर तो समझो बराबर का ही था। भाई तो दायां बाजू होते हैं भई। भाइयों जैसा कोई दूसरा रिश्ता नहीं। कहते हैं, बिना भाइयों के तो महफ़िलें भी नहीं सजतीं।’
‘हूं…।’ लड़के के हुंकारे में दर्द था।
‘मां-बापू का क्या हाल है? माता-पिता के लिए नौजवान बेटे की मौत बहुत बड़ा सदमा होती है। मांएं तो जीते-जी ही मर जाती हैं।’
‘बापू तो ठीक है, मगर मम्मी का ब्लड-प्रैशर बढ़ने लगा था। अब ठीक हैं, दवाई लेती हैं।’
‘ख़याल रखा करो अब तुम उनका। अब तो उनका इकलौता सहारा तुम ही हो। तुम गबरू हो, उनको हौसला देते रहा करो। उनका दुख तुम ही कम कर सकते हो। नहीं तो दुख बंदे को अंदर ही अंदर यूं खोखला कर देता है जैसे लकड़ी को घुन।’ आदमी ने दिलासा देते हुए कहा।
‘ताया, ख़याल तो रखते हैं…।’ लड़का बोला।
‘अच्छी बात है!’
फिर कुछ देर उनके बीच ख़ामोशी तैरती रही।
फिर एक गहरा निश्वास भरते हुए आदमी बोला, ‘बेटा, अब तो ऐसा लगता है जैसे अपने गांव को कोई नज़र लग गई है। अपने गांव के मल्लां के मिंदर को ही देख लो, बेचारा सल्फास की गोलियां खाकर मर गया। कितनी बुरी बात हुई ना!’
‘हां, बहुत ही बुरी बात हुई ताया! किसी ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके जैसा हंसने-खेलने और हंसी-मज़ाक करने वाला बंदायूं मौत को गले लगा लेगा!’ लड़का ने कहा।
‘बहुत खुशदिल इंसान था वह… पर कहते हैं जब से उसने दो एकड़ ज़मीन बेची थी, तभी से चुप-चुप सा रहने लगा था। अकेला, खोया-खोया सा रहता। बस सिर पर चढ़े कर्ज़े ने उसकी जान ले ली! ज़मीन बेचकर भी पीछा नहीं छूटा।’ आदमी ने बताया।
‘ताया, अकेले मिंदर की ही बात नहीं है… यह तो घर-घर की कहानी है, गांव-गांव यही सब तो हो रहा है। रोज़ अखबारों में यही लिखा पढ़ते हैं, खबरों में सुनते हैं। पंजाब में कर्ज़ की मार झेलते रोज़ तीन-चार लोग खुदकुशी कर लेते हैं! फसल होती नहीं, हो जाए तो सही दाम नहीं मिलता। दिन-रात कर्जा बढ़ता ही जाता है, दुगुना से चौगुना होता जाता है।’
‘लेकिन बेटा, कर्ज़ की खातिर जान दे देना कोई समझदारी की बात तो नहीं। अच्छा-बुरा वक्त तो आता ही रहता है आदमी पर। मुश्किलें इंसानों पर ही पड़ा करती हैं। लेकिन इसका कोई हल मौत कतई नहीं। इंसान मरकर खुद तो छूट जाता है, पर पीछे परिवार बर्बाद हो जाता है। मिंदर के बच्चे अभी स्कूल में पढ़ते हैं। घर में बहनें भी शादी लायक हो गई हैं। अब क्या वे करेंगे बताओ भला! बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी बीच में ही छूट गई। वे तो अब उम्र भर अंधेरा ही ढोएंगे ना।’ आदमी ने गहरी हमदर्दी प्रकट करते हुए बोला।
‘इतना सोचता तो वह खुदकुशी ही क्यों करता?’ ‘वो कहते हैं ना, जब इंसान परेशान हो, दुखी होतो उसकी सोच भी काम करना बंद कर देती है। पर्दा पड़ जाता है इंसान की अक्ल पर! कुछ नहीं सूझता उसको।’ एकाएक वह चुप धार लेता है मानो उसे भी कुछ सूझ नहीं रहा हो।
कुछ देर बाद उस चुप को लड़के ने तोड़ा, ‘ताया… एक काम से आया था मैं तेरे पास। मैं तो तेरे घर ही जा रहा था, पर यह अच्छी बात हुई कि तुम यहीं बैठे मिल गए।’
‘हां शेरा बता, क्या काम है तुझे मुझसे?’ आदमी ने पूछा।
‘तुम्हें याद है न ताया, कई महीने पहले तुम मेरे लिए एक लड़की का रिश्ता लेकर आए थे।’ लड़का झिझकते हुए बोला।
‘बिलकुल याद है बेटा… धरमपूरा में हमारी दूर की रिश्तेदारी है।’
‘ताया, उस लड़की का रिश्ता कहीं और हुआ कि नहीं?’ लड़के ने पूछा।
‘लगता है शायद अभी नहीं हुआ।’ आदमी ने कुछ सोचते हुए कहा।
‘वह रिश्ता मुझे बहुत पसंद है। लड़की भी और वे लोग भी। एक बार मैंने उनके बारे में पूछताछ की थी। ताया, तुम उनसे दोबारा बात चलाकर देखो न मेरे बारे में।’ लड़के के स्वर में एक विनती थी।
‘हां, उन्होंने तब जवाब दे दिया था। कहते थे कि हमको शादी में बहुत खर्च करना है, पर लड़के के पास तो ज़मीन ही बहुत थोड़ी है। उनको ज़्यादा ज़मीन वाले लड़के की तलाश थी।’ आदमी ने बताया।
‘...तभी तो मैं कह रहा हूं कि अब दोबारा बात करके देखो उनके साथ। तुम्हें तो पता है, अब मेरा भाई जसदीप तो रहा नहीं। अब तो मेरी ज़मीन दुगुनी हो गई है। पहले जो मेरे हिस्से पांच किल्ले आते थे, अब दस किल्ले हो गए हैं।’
‘हैं! क्या कहा!’ हैरानी में आदमी के मुंह से निकला। उसके चेहरे के हाव-भाव दिखाई नहीं दे रहे थे, क्योंकि अब अंधेरा और गहरा हो गया था।
‘ताया, अगर तुम चाहो तो यह काम हो सकता है।’ लड़के ने जैसे मिन्नत की।
‘हूं…।’ आदमी ने हुंकारा-सा भरा।
लड़के ने ऊपर आसमान की ओर देखा। तभी एक तारा टूटा था जो रोशनी की मद्धम–सी लकीर छोड़ता आंखों से ओझल हो गया।
अनुवाद : सुभाष नीरव

